भागता शहर हूँ मैं

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भागता शहर हूँ मैं

By |2017-08-01T16:15:56+00:00July 19th, 2017|Categories: कविता|Tags: |0 Comments

झूठ का बाना पहने

हर आदमी में

भागता शहर हूँ मैं……

घर और कार की

किस्तों में बँटा ….

मँहगे मोबाइल पर

जेंटलमेन का स्वाँग ओढ़ता

हर आदमी में

थका शहर हूँ मैं……

ट्रैफिक से रोज़ गुथ्थमगुथ्था होता

फिर हॉर्न की पौं ..पौं बजाता

सिस्टम को दो-चार

भद्दी गालियाँ देता

हर आदमी में

झल्लाता शहर हूँ मैं…..

शनिवार और रविवार को

खुशी का ठौर ढूँढता

प्लास्टिक की हँसी लिए

बड़े से मॉल का हिस्सा होकर

हर आदमी में

बस पत्थर सा शहर हूँ मैं ॥

-डॉ.उषा दशोरा 

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