अंधेर नगरी , चौपट राजा

अंधेर नगरी , चौपट राजा

By |2017-08-02T20:24:30+00:00July 19th, 2017|Categories: आलेख|Tags: |0 Comments

सोन चिड़िया कहलाने वाला मेरा देश भारत समय -समय पर आक्रमणकारियों के द्वारा लूटा जाता । हमारी विवश्ता कि हम अपने को लुटवाते रहे । महमूद गजनवी से लेकर मुगल सल्तनत के नष्ट होने तक भारत की अपार सम्पदा , धरोहर एवं संस्कृति को लूटा जाता रहा ।

रामकृष्ण , विश्वामित्र , वशिष्ठ , अपाला गार्गी आदि विद्वतजनों की यह भूमि , यदि वर्तमान पर दृष्टिपात करे, तो ‘अंधेर नगरी के सिवा कुछ और नजर नही आती । स्वार्थ लिप्सा में लिप्त हम किसी के मान सम्मान की हत्या करने में जरा भी चूक नहीं करते है , मान – सम्मान को छोड़ इंसान की भी हत्या कर देते है
महत्वाकांक्षा की पूर्ति में उतावले हम उस अंधे धृतराष्ट्र तथा आप उस दुर्योधन की की भाँति है है जो पूरे कुल का विनाशक है ।

हर युगीन परिस्थितियाँ बदलती है जिस समय भारतेन्दु के इस नाटक की रचना हुई तब से आज तक परिस्थितियों में अन्तर आया है । अंधेर नगरी तो हर युग में मौजूद रही , बस उसका स्वरूप बदला है । भ्रष्टाचार , सत्ता की जड़ता , अन्याय पर आधारित व्यवस्था जो किसी मूल्य की नहीं है । यह तो हर युग की विशेषता रही है । जिस राज्य में विवेक – अविवेक का भेद नहीं होता उस राज्य में प्रजा कैसे सुखी रह सकती है ? क्योंकि भ्रष्टाचार व्यवस्था की आत्मा में गहराई से समाया हुआ है और बड़े – बड़े चोर सरेआम घूमते रहते है ।
महत्वाकांक्षा की पूर्ति मेंआमादा हम उस शिष्य की के सदृश है जो भारतेन्दु के नाटक ” अंधेर नगरी ” में अपने गुरू को छोड़ अय्याशी जीवन व्यतीत करने के लिए अंधेर नगरी रूक जाता है । जहाँ पर हर चीज का भाव ‘ टका सेर ‘ पाता है । टका सेर से मेरा आशय वोटों को बटोरने की राजनीति की आड़ में एवं वर्गगत समानता की आड़ में सत्तापक्ष द्वारा चली गयी कूटनीति
चालों से है , ये कूटनीतिक चालें आरक्षण एवं सामाजिक समानता के नाम पर लोगों से छल कर रही है ।

“रिश्वत की संस्कृति ” सरकारी और गैर सरकारी महकमे में पूरे प्रभाव के साथ जीवित है जो घोटालों का ही सुधरा रूप है कहीं भी किसी भी डिपार्टमेंट में छोटे से छोटा , बड़े से बडा काम बिना रिश्वत नही होता । सत्ता में कोई भी आये , सभी जनता का खून चूसते है जनता को इन्तजार रहता है कि कोई उद्वारक आयेगा और युगों से चली आ रही व्यवस्था में सुधार होगा । जिसके कर्मों से कुशासन रूपी अंधा राजा फाँसी पर लटकेगा ।

और सुशासन रूपी चेला (शिष्य ) दूसरे शब्दों में जनता या देशवासियों को मुक्ति मिलेगी ।
यहीं हालात न्यायलयों की है “जिसकी लाठी , उसकी भैंस “। न्याय उसी को मिलेगा जिसकी लाठी में दम है । काफी लम्बी प्रक्रिया के बाद अपराधी साफ बच जाता है निर्दोष को ही सजा मिलती है और गरीब तारीख पर तारीख लेते – लेते या तो मर जाता है या सुसाइड कर लेता है ।
‘अंधेर नगरी की ” यहीं प्रासंगिकता है कि दुनियाँ के किसी भी देश की बदलती शासन की परम्परा का लम्बा इतिहास “अंधेर नगरी ” से स्वत: जुड़ जाता है । “अंधेर नगरी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रजातंन्त्र की घोर असफलताओं और व्यवस्थाओं के पतन का प्रतीक है ।

– डॉ मधु त्रिवेदी

Comments

comments

Rating: 4.5/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  • 1
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    1
    Share

About the Author:

Leave A Comment