हमने देखी है

हमने देखी है उन आँखों में खौफ की परछाईं,

हम ने देखी है भरी दुनिया मे उनकी तन्हाई .

हमने बचपन को सुलगते हुए भी देखा है ,

नन्ही सी उम्र में माथे पर चिंता की रेखा है .

सच तो यह है अपनी ख़ुशी के आगे  ,

कुछ कभी सोच नहीं सकते हैं हम अभागे

हाथ में इनके किताबें हैं ,न खिलौने हैं

इनको बस उम्र भर मुफलिसी के गम ढोने हैं .

इनकी आँखें न देखतीं सपने ,

सब  झिडकते इन्हे पराये हों या हों अपने .

क्या ज़रुरत थी ? इन्हे क्यों किया तूने पैदा ?

रखना था जब इन्हे हर ख़ुशी से अलहदा

नन्हे कांधों पे ज़िम्मेदारी क्यों ?

सूखी  रोटी ख़ुशी पे भारी क्यों ?

कब तक कानून किताबों में सजे बैठेंगे ?

कब ये नन्हे ज़रा जीवन में ख़ुशी देखेंगे ?

मंजु सिंह

 

 

 

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