तन्हाई में डूबी रातों में
फिर कोई कहानी याद आई,
कुछ अपनें जमाने याद आये,
कुछ उनकी कहानी याद आई,
हम भूल चुके थे जिसनें हमें
दुनिया में अकेला छोड़ दिया,
जब गौर किया उस सूरत में
अपनेपन की निशानी याद आई,
जब तक भी रही वो साथ मेरे,
तन्हा हमें होनें ना दिया,
रूखसती में उसकी आंखों से,
बहती वफा की निशानी याद आई।
उसको मैं भूल चुका था शायद,
दुनिया की झूठी बातों में,
पर याद बहुत वो आती है,
तन्हा सी भीगी रातों में,
वो नहीं सही उसकी याद सही,
उनकों तो मुझ तक आनें दो,
इन यादों को लेकर मुझको,
चिरनिद्रा में सो जाने दो।

सुरेन्द्र श्रीवास्तव 

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