संत महाकवि तुलसीदास द्वारा लिखित ‘रामचरितमानस’ न केवल हमारे देश का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है बल्कि सम्पूर्ण विश्व के अन्य महाकाव्यों में भी महान् काव्य-ग्रंथ है। कवि शिरोमणि तुलसीदास द्वारा रचित सभी सुकृतियों से धर्मनिरपेक्षता और मानवीयता का संदेश सुनाई पड़ता है, पर चिंता की बात है कि विद्वानों, मनीषियों, समीक्षकों और चिंतकों के उद्गार में ऐसे महान ग्रंथ भी आलोचना के शिकार रहे हैं। मेरी राय में गोस्वामी तुलसीदास निश्चय ही महान विचार के संत महाकवि थे, पर भारत में जातीयता बुरी चीज रही है। ‘रामचरितमानस’ पर मुख्य रूप से शूद्र और नारी की निंदा का आरोप लगाया जाता है, जो युक्तिसंगत नहीं है। संत की प्रकृति का वर्णन करते हुए कविवर तुलसीदास कहते हैं- जड़ चेतन गुन दोषमय, बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहि पथ, परिहरि बारि बिकार।।
अर्थात ईश्वर ने इस जड़-चेतन संसार को गुण-दोषयुक्त बनाया है किन्तु संतरूपी हंस दोषरूपी जल को छोड़कर गुणरूपी दूध का पान करता है। ‘कवितावली’ में अपने सम्पूर्ण कर्तृत्व और व्यक्तित्व का परिचय देते हुए कवि शिरोमणि तुलसीदास जी कहते हैं-
धूत कहौ, अवधूत कहौ
रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ, कोऊ।
काहू की बेटी सो, बेटा न ब्याहब,
काहू की जाति बिगार न सोऊ।।
तुलसी सरनाम गुलाम है रामुको,
जाको, रुचै सौ कहै कछु ओऊ।।
मांगि के खैबो, मसीत को सोइबो,
अर्थात कवि के दृष्टिबिन्दु में चाहे कोई धूर्त कहे या ‘परमहंस’ कहे, राजपूत कहे या जुलाहा कहे, मुझे किसी की बेटी से तो बेटे का ब्याह करना नहीं है, न मैं किसी से सम्र्पक रखकर उसकी जाति ही बिगाड़ूँगा। तुलसीदास तो श्री रामचन्द्र का प्रसिद्ध गुलाम है, जिसको जो रचे सो कहो। मुझको तो माँग के खाना और मस्जिद में सोना है, न किसी से एक लेना है, न दो देना है। इस प्रकार हम देखते हंै कि उनके कर्तृत्व में कहीं संकीर्णता नहीं मिलती है। ‘रामचिरतमानस’ के बालकाण्ड के अंतर्गत खल वंदना में कविवर तुलसीदास कहते हैं-
बायस पलिअहि अति अनुरागा।
होहिं निरामिश कबहुँ कि कागा।।
यहाँ कवि द्वारा निरूपति ‘बायस’ शब्द प्रासंगिक नहीं लगाता। क्योंकि कौए को कोई पालता नहीं है। अगर ‘बायस’ की जगह ‘पायस’ का पाठ किया जाये तो सदंर्भ नयी अर्थवत्ता से अनुप्राणित हो उठता है। इसका अर्थ यह हुआ कि कौआ को अत्यंत प्यार से खीर खिलाया जाय फिर भी वह निरामिश नहीं हो सकता। यहाँ ‘बायस’ की जगह ‘पायस’ करने पर सदंर्भ नहीं बदलता है बल्कि संदर्भ सार्थक हो जाता है। इसी क्रम में क्रमशः उनका कथन है कि जीवात्मा और परमात्मा में अभिन्नता है। मानसकार का दोहा उल्लेख्य है-
जौ अस हिसिशा करहिं नर, जड़ विवेक अभिमान।
परहिं कलप मरि नरक महुँ जीवकि ईस समान।।
यहाँ पर मानसकार का सही कथन है कि अज्ञानी मनुष्य यदि अभिमानवश जीव को ईश्वर समान समझता है तो यह उनकी निरी मूर्खता है। यहाँ पर ‘ईस समान’ का पाठ सर्वेश्वर से एकता है। तुलसीदास जी का यह कहना निःसंदेह सत्य है कि जीव ईश्वर की बराबरी नहीं कर सकता। पर इस दोहे को पढ़कर यह नहीं समझना चाहिए कि जीवात्मा का ईश्वर से एकता नहीं है। समानता और एकता में फर्क है। इस संदर्भ की पुष्टि करते हुए महाकवि कहते हैं-
सुरसरि मिले सो पावन जैसे।
ईस अनीसहि अंतर तैसे।।
पर वही मदिरा गंगाजी में प्रविष्ट होने पर जिस प्रकार पवित्र हो जाती है, जीव और ईश्वर में उसी प्रकार का भेद है। ‘अयोध्याकाण्ड’ अतंर्गत ‘भरत कौशल्या संवाद’ में कविवर तुलसीदास जी भक्ति विमुख नारी के प्रसंग में कहते हैं-
बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी।
सकल कपट अध अवगुन खानी।।
यह प्रसंग महाकवि तुलसीदास जी ने कैकेयी के संबंध में उद्धृत किया है। पुनः कवि वशिष्ठ जी का वचन उद्धृत करते हैंμ सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।। कहने का ताप्पर्य यह है कि कविवर तुलसी ने वैसी ही नारी की निन्दा की है, जो रामभक्ति से रहित है। संत महाकवि तुलसीदास सात्त्विकता से परिपूर्ण नारी की वंदना की है। कवि तुलसीदास रामचरितमानस के अतंर्गत शिव पार्वती संवाद में नारी की पराधीनता पर आठ-आठ आँसू बहाते हैं-
कत विधि सृजीं नारि जग माहीं।
पराधीन सपनेहू सुख नाहीं।।
यहाँ पर कवि ने नर-नारी की समानता का स्वर मुखर किया है। ‘ढोल गंवार सूद्र पशु नारी’ जैसी बहुचर्चित पंक्ति को लेकर तुलसी को नारी विरोधी कहा जाता है। ‘ढोल गंवार सूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी’ यह उक्ति तब कही गयी है जब श्रीराम समुद्र पर कोप करते हैं। पहले तो यह उक्ति तुलसीदास की सही नहीं प्रतीत होती है। क्योंकि ढोल गंवार शूद्र पशु नारी के प्रसंग का निरूपण यहांँ नहीं हुआ है। इस स्थल पर तो श्रीराम समुद्र से रास्ता माँंगते हैं। समुद्र द्वारा रास्ता न देने श्रीराम के कोप का स्वाभाविक वर्णन हुआ है। फिर अगर यहाँ ‘ताड़ना’ का अर्थ उद्धार करना व रक्षा करना लगाया जाय तो युक्तिसंगत ही माना जायेगा। महाकवि तुलसी की दृष्टि में पुरुष और नारी का सम्मान बराबर है। उनके रामराज्य में नर-नारी की प्रतिष्ठा हुई है-
एक नारि व्रत रत सब झारी
ते मन-वच-क्रम पति हितकारी।
‘रामचरितमानस’ के लंकाकाण्ड में चरित्रा की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है। रामचरितमानस में निरूपति राम मर्यादा पुरुषोत्तम के समान हैं। कवि की काव्यमयी अभिव्यक्ति इस प्रकार है-
कवच अभेद विप्र गुरु पूजा।
एहि सम विजय उपाय न दूजा।।
कविवर तुलसीदास ने अरण्यकाण्ड में ब्राह्मणत्व पर प्रकाश डाला है। कवि की उक्ति अवलोक्य है-
पूजिय बिप्र सील गुन हीना।
सूद्र न गुन गन ज्ञान प्रवीना।।
अर्थात् विप्र का यहाँ पुनर्पाठ महान व्यक्ति से है, जाति से नहीं। यहाँ कवि जातीयता को महत्त्व न देकर मानवता को महत्त्व देते हैं। ‘सूद्र’ का अर्थ नीच है, चैथा वर्ण शूद्र नहीं। इस चैपाई का अर्थ यह है-
विनम्रता और शालीनता से रहित ब्राह्मण को नहीं पूजना चाहिए, क्योंकि विद्या में निपुण व्यक्ति नीच नहीं होता। कहने का भाव यह है कि विद्या में निपुण व्यक्ति का निरादर नहीं करना चाहिए। विद्या में पारंगत छोटा व्यक्ति से भी विद्या रूपी रत्न प्राप्त करने के लिए उनके प्रति श्रद्वा रखनी पड़ती है। क्योंकि रामचरितमानस मानता है-
सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।
श्री रघुवीर परायन, जेहि नर उपज विनीत।।
रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में हिन्दू समाज की वर्ण-व्यवस्था के तहत तेली, कुम्हार, चांडाल, भील, कोल और कलवार आदि की भत्र्सना तुलसीदास जी ने की है। चैपाई इस प्रकार है-
जे बरनाधम तेलि कुम्हाड़ा स्वपय, किरात कोल कलवारा।
नारि मुई गृह सम्पति नासी मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी।।
और जो संत निर्भीक स्वर में जाति-पाँति से मुक्ति की घोषणा करते हैं- मांगि के खैबो मसीत को सोइबो
ऐसे वीतरागी महापुरुष के मुख से उपर्युक्त उद्गार नहीं निकल सकता है। उक्त पंक्तियाँ पूर्व प्रसंग से भी भिन्न हैं तथा उनके छंद की मात्रा से भी भिन्न है। कवि तुलसीदास जी ने अपने समय में प्रचलित शैव वैष्णव मतों को दूर करने के विचार से भी राम के द्वारा भक्ति का नवीन मार्ग दिखाया गया है। कवि की उक्ति इस प्रकार हैं-
औरउ एक गुपुत मत, सबहि कहऊँ कर जीरि।
संकर भजन बिना नर, भगति न पावइ मोरि।।
श्रीराम प्रजा को सद्गुरु का महत्त्व तथा भक्ति का भेद बताते हैं। यहाँ ‘कर’ का अर्थ किरण है। किरण ज्योति स्वरूप है अर्थात् श्रीराम भक्ति का भेद बताते हुए कहते हैं जो सूरत की धारों को जोड़कर कल्याण करने वाला भजन करता है, वही मेरी भक्ति को पाता है। यहाँ ‘गुपुत मत’ से मतलब भक्ति का रहस्य है। इसमें गोस्वामी तुलसीदास जी ने उपासना की नयी युक्ति बताई है। यह भक्ति त्रिदेवा की भक्ति नहीं है बल्कि सदगुरु द्वारा बताई गयी का भक्ति है। इस अभेद भक्ति से मानव-मानव में समरसता का संचार होगा। कविवर तुलसीदास ने बालकाण्ड के अंतर्गत शिव-पार्वती संवाद में राम निर्गुण स्वरूप के बारे में कहता है-
बिनुपद चलइ सुनइ बिनु काना
कर बिनु करम करइ विधि नाना।
आनन रहित सकल रस मोगी
बिनु बानी बकता बड़ जोगी।
उपर्युक्त पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि राम का स्वरूप निर्गुण है। यह मन, बुद्धि और वचन से परे है। जबकि रामचरितमानस में विद्वान मानते हैं कि इसमें दाशरथि राम के स्वरूप की स्थापना है, पर पुनर्पाठ से स्पष्ट होता है कि यहाँ राम के निराकार रूप को वर्णित किया गया है। बिना पाँव के चेतना, बिना कान के सुनना, बिना हाथ के संसार कार्य व्यापार करना, बिना मुँह के स्वाद लेना और बिना वाणी के कुशल वक्ता होना, ये सब बातें परमात्मा के रहस्य को बताती हैं। यहाँ कवि ने अनुभूति की बात बताई है, बुद्धि की नहीं। सत्य की चरम अनुभूति ही अखंड भक्ति है। ज्ञान और अनुमूति में बड़ा अंतर है। बुद्धि से सत्य का अनुभव नहीं होता यह तो सूरत मार्ग से अंतर मार्ग की यात्रा है। यहाँ पुनर्पाठ किया जाये कि बिना मुँह कान के केकड़ा होता है। ऐसा कहना उचित प्रतीत नहीं होता। रामचरितमानस में रामभक्ति की तुलना में गुरुभक्ति की श्रेष्ठता दिखाई गयी है। श्रीराम गुरु के आशीर्वाद से धनुष-बाण तोड़ देते हैं। गुरु की महता पर प्रकाश डालते हुए वे कहते हैं-
तुम्हतें अधिक गुरहि जिय जानी।
सकल भाय सेवहिं सनमानी।।
मानसकार ने बालकांड के प्रारंभ में ही गुरु की श्रेष्ठता का मौलिक निरूपण किया है। उनका दोहा अवलोक्य है-‘‘बन्दौं गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।’’ यहाँ नररूप अर्थात मनुष्य के रूप में जो परमात्मा है। ऐसा अर्थ निकालना संदर्भ की महत्ता को उजागार करता है। तुलसीदास जी के गुरु का नाम भी नरहरि था। मनुष्य के रूप में हरि गुरु के प्रसंग से सार्थकता ही प्राप्त करता है। ‘रामचरितमानस’ के अरण्यकाण्ड में भगवान श्रीराम ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया है। भगवान श्रीराम शबरी के आश्रम में आये। शबरी अपने आश्रम में भगवान राम को आते देखकर प्रसन्नता से अभिभूत हो गयी। उनके सम्मुख होकर शबरी निवेदन करने लगी-
केहि विधि अस्तुति करउँ तुम्हारी।
अधम जाति मैं जड़ मति भारी।।
भगवान श्रीराम ने कहा-
कह रघुपति सुनु भामिनी बाता।
मानऊँ एक भगति कर नाता।।
अर्थात् भगवान राम ने कहा किहे भामिनी (नारी) मेरी बात सुनो, मैं केवल भक्ति का नाता मानता हूँ, जाति का नहीं। भगवान श्रीराम ने शबरी को ‘भामिनी’ इसलिए कहा, उसमें नवों प्रकार की भक्ति थी। भामिनी का अर्थ शीघ्र क्रुद्ध होने वाली नारी और सुन्दरी भी होता है। न तो शबरी क्रुद्ध होने वाली नारी थी, न तो सुन्दरी थी। फिर भी भगवान श्रीराम ने उनकी भक्ति देखकर ही उन्हें सुन्दरी कहा। रामचरितमानस में निरूपति विद्या भक्ति के संबंध में श्रीराम शबरी को उपदेश देते हैं-
नव महँ एकउ जिन्हके होई।
नारि पुरुष सयराचर कोई।।
सोइ अतिसय प्रिय मामिनी मोरे।
सकल प्रकार भगति दृढ तोरे।।
अर्थात् कवि कहते हैं कि नवीं भक्ति में जिनको एक भी हो, वह मुझे अत्यन्त प्यारा है। इससे यह अर्थ युक्ति-संगत प्रतीत नहीं होता है कि एक ही भक्ति करने से जीवन में मोक्ष मिलता है। पहली भक्ति संत रूप की उपासना है। इसी रूप मार्ग से अंतर मार्ग की यात्रा होती है। इस भक्ति में जन्म-जन्मातर के प्रयास के बाद साधना का चरम फल मिलता है। ‘कैवल्य’ व मोक्ष प्राप्त करने के लिए और परमात्मा से अभिन्नता के लिए नवम भक्ति का निरंतर अभ्यास करना युक्तिसंगत है।

— डॉ० छेदी साह

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