नागार्जुन की प्रकृति कविता

नागार्जुन की प्रकृति कविता

By |2017-06-15T22:45:57+00:00June 15th, 2017|Categories: आलेख|2 Comments

यद्यपी नागार्जुन की कविता प्रमुख रूप में समसामयिक सामाजिक राजनीतिक संदर्भ की कविता है, तथापि इससे इतर संदर्भों की भी अनेक कविताएँ उनके यहाँ प्राप्त होती है।उन इतर सन्दर्भ परक व कविताओं पर बिना विचार किये उनके काव्य के समग्र स्वरूप का समीचीन रेखांकन औऱ मूल्यांकन नहीं किया जा सकता ।
इतर संदर्भों में नागार्जुन की कविता में व्यक्तिपरक संदर्भ,संस्कृतिक संदर्भ,ऐतिहासिक संदर्भ पौराणिक संदर्भ आदि की कविताएं प्राप्त होती है।नागार्जुन का कविता इन संदर्भो में व्यष्टि चेतना से अधिक उन्मथित हुआ है। उनकी आरंभिक कविताओं में इस प्रकार के संदर्भ सहजता से प्राप्त होते है।
व्यष्टिपरक संदर्भ की उनकी कविताओं को कई वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-
० मानवीय प्रेमपरक संदर्भ
० पशुपक्षी प्रेमपरक संदर्भ
० जीव विशेष से प्राप्त त्रासपरक संदर्भ
० प्रकृति-प्रेमपरक संदर्भ
नागार्जुन की कविता में प्रकृति प्रेम के दो प्रकार के संदर्भ प्राप्त होते है।पहला प्रकार वह है, जहाँ नागार्जुन ने अपनी स्फुट कविताओं अथवा कथा- काव्य की रचना करते हुए उद्दीपनात्मक अथवा पृष्ठभूमि निर्माण के रूप में प्रकृति को प्रस्तुत किया है। पर इस प्रकार के प्रकृति- चित्रण में उनकी व्यष्टि चेतना के दर्शन होते है। निश्चय ही ऐसे संदर्भ में उनकी वैसी प्रकृति परक कवितायें नहीं है,जिनमे उन्होंने करते हुए उन्हें समाज की राजनीतिक चेतना की अर्थवत्ता से अनुप्राणित कर दिया है ।
शुद्ध रूप में प्रकृति-निरुपण के संदर्भ के अंतर्गत नागार्जुन की निम्नलिखित कवितायें आती है-(क) ‘बलाका’ (ख)”सफेद बादल “ (ग) “महामना मेघराज” (घ)”दो पंचक” (ङ)”बदलियाँ” (च)”बेतवा किनारे” (छः)”फूले कंदव” (ज) “धन कुरंग” (झ) “मेध बजे” (ट) “धुप में खिले पात” (ठ) “पिघल रही चाँदनी” (ड) “अब के इस मौसम में” (ढ़) “हरे-हरे नये-नये पात” (ण)”बसंत की अगवानी” (त) “बादल को घिरते देखा है “ (थ्) “कल और आज” (द्) “भस्मानकुर”
केदारनाथ अग्रवाल ने उनकी कविताओ मे रोमान का बार-बार निषेध किया है। किन्तु नागार्जुन के पुरे काव्य- संसार को देखने से उस निषेध का सहज ही खंडन हो जाता है। उक्त समीक्षक के अनुसार रोमांस को केवल नारी सौंदर्य के उद्दाम आकर्षण में रेखांकित किया जाता है, किन्तु यह सत्य नहीं है। सच्चा रोमांस अतीत के प्रति विकल स्मरण में भी उजागर होता है। वह भावविह्वल उद‌‌‍्गार के प्रस्फुटन में भी झाँकता है और गहरे रागात्मक संबंध के अभाव को तिलमिला देने वाली व्यथा से भी उदभूत होता हैं| रोमान ही कवी को प्रकृति की ओर खींचकर ले जाता हैं और रोमान ही अमूर्त भावों को मूत्तता प्रदान करने का साधन भी बनता है| उपर्युक्त कविताओ में नागार्जुन की मुख्य कविताओ का विवेचन करना समीचीन प्रतीत होता है | ये कवितायेँ हैं : (क) “ कल और आज “ (ख) “फिसल रही चाँदनी” (ग)” बादल को घिरते देखा है” (घ) “ वेतवा किनारे “ (ङ) “ धुप में खिले पत” |
(क) कल और आज:- नागार्जुन की यह कविता प्रकृति के दो रूपों को तुलनात्मक ढंग से स्पष्ट करती है| कवी ने बीते कल के ग्रीष्म से आज के पावल की तुलना की है | कल तक बदल के न घिरने के कारण हताश खेतिहर उन्हें गालियों देते थे, गोरियों के झुंड धुल में नहाते रहते थे, धनहर खेतो की माटी पथराती हुई थी, मेढ़क धरती की कोख में ग्रीष्म कुल में दुबके पडे थे | आसमान का रंग बदरंग था | पर वह घिर आई है| कवी पूर्व खंडन में बादल के नहीं घिरने की हताश, निराश और विकलता का वस्तुगत वर्णन प्रस्तुत करता है | किन्तु कविता के द्वतीय खण्ड में उसका भावाभिव्यंजन आत्मनिष्ठ हो उठता है | तभी उसे आज बादल का, तम्बू तना दीखता है| पावस रानी पायल छमकाती दीखती है | झींगरों की शहनाई अविराम बजती सुनाई पड़ती है | मोर नाचते थिरकते कूक पड़ते हैं| दूब की फुनगियों में प्राण का संचार हो जाता है, और ग्रीष्म अपने लावलश्कर समेटकर चुपचाप जाने लगता है | इस कविता के सहज प्रकृति-प्रेम के शुद्ध संदर्भ की उपेक्षा करते हुए प्रसिद्ध माक्सर्वादी,समीक्षक डॉ० रामविलास शर्मा ने यथाथॅवादिता और प्रगतिवादिता के व्यामोह में यह लिख दिया है की “ यह हिंदी कविता का नया यथाथॅवाद है |” और “ यह लोक-संस्कृति की सहज आत्मीयता है |” और धरती की कोख में दुबके पड़े मेढ़क जो तुच्छ और नगण्य है , प्रकृति की समूची कार्यवाही में वह भी कवित्वपूर्ण बन जाते है “ साथ ही साथ इसे “ वर्ष के उधीपन विभावों की रीतिवादी फौज के बदले एक सीधी सी आए दिए की बात” कहा है| पर सत्य यह है की इस कविता में कहीं यथाथॅवाद नहीं है| पायल “ शहनाई” और “ मोर ” रोमान के शब्द है तो “तम्बू “ और “लावलश्कर “ सामंतवादी राजसी शब्द है| “ खेतिहर” और धनहर खेतो की माटी का “ उल्लेख कवी ने कल के संदर्भ मे तो किया है, पर आज के संदर्भ में इनका कहीं कोई जिक्र नहीं हो पाया है | मेढ़क और वर्षा का प्रसिद्ध सहभाव संबंध है | यहाँ तुच्छ और नगण्य का बोध नहीं है | हिंदी की असंख्य वर्षा- परक कविताओ में मध्यकाल में यह सहभाव कवित्वपूर्ण मे उपस्थित हुआ है |कवी ने मेढ़क के साथ- साथ मोर का भी उल्लेख किया है| शर्मा जी ने रीतिकालीन उधीपन विभावो की फौज से दूसरी कोटि की कविता माना हैआश्चर्य होता pहै | निराला के “बादल-राग“ में बिप्लक का प्रखर स्वर मुखर हुआ है, उन्होंने तुच्छ और नगण्य का चित्रण किया है| वहाँ यथाथॅवाद है, पर नागार्जुन की इस कविता में वर्षागम का उल्लसित अभिसचन और ताप की पृष्ठी-भूमि मे उसके आगमन का एक वर्णनात्मक भावात्मक चित्रमर हैं|
(ख) फिसल रही चाँदन-: फिसल रही चाँदनी “नागार्जुन की ऐसी प्रकृति परक कविता है जिसमे चतुर्दिक व्याप्त हो रही,फ़ैल रही चाँदनी का मनोरम मानवीकृत वर्णन प्रस्तुत किया गया हैं| वह ऐसी चाँदनी है जो पीपल के पत्तों से लेकर आँगन के पिछवारे में, नालियों और बोतलों के टुकड़ों पर तथा दूर उधर बुर्जी तक पर फ़ैल रही है |
कवि ने अपने क्रिया –प्रयोगों द्वारा चाँदनी की विशेषताओ को उजागर किया है |जमने,घुलने,चमकने,मचलने,उछलने,नाचने और कूदने की क्रियाये यहाँ चाँदनी को स्वरूपित कर रही है |
उपर्युक्त सारी क्रियाओ के मूल में कवि की निजी दृष्टी को बड़ी सरलता से देखा जा सकता है जिसके मूल में नागार्जुन की व्यष्टि चेतना क्रियाशील है
ध्यातव्य यह है कि चाँदनी यहाँ प्रतीक नहीं बनी है, शुद्ध प्रकृति रूप में वहीं निरूपित हुई है | पर ऐसी नहीं है कि “इस कविता के प्रत्येक चित्र से, जो चाँदनी के क्रिया – व्यापार से युक्त है, चाँदनी का सौंदर्य का फटा पड़ता है | चाँदनी का ऐसा उद्दाम रूप इसके पहले हिंदी कविता में चित्रित नहीं हुआ है। पहली बात तो यह है कि यहाँ कवि द्वारा वर्णित-निरुपित सारी क्रियाये सौन्दर्यपरक नहीं है | दूसरी बात है कि यह १९७६ ई० में लिखी गई है और ‘निराला”तथा “मुक्ति बोध” ने अपनी कई कविताओ में चाँदनी को इससे अधिक उद्धाम रूप में प्रस्तुत किया है | निराला के यहाँ तो चाँदनी की मुस्कान कहर ढाती है और “मुक्तिबोध” के यहाँ चाँदनी शौख और बदमाश भी है |
[ग] बादल को घिरते देखा है :-नागार्जुन की इस प्रसिद्ध कविता में पर्वतीय प्रकृति पूरी तरह रूपायित हुई है | यहाँ बादल है, झील है,तालाब है,तलहटी है,चकवा-चकई है,हंस है,हरिण है,और है किन्नरियाँ,जो अपनी मृदुल अँगुलियों से वंशीवादन कर रही है,पर इस सारे चित्रण के बीच कवि पर बादल का ही सघन प्रभाव स्पष्ट होता है।कवि ने बादल के घिरने का मोहक वर्णन किया है |उसने पर्वत के शुभ्र शिखर पर बादल को घिरते हुए देखा है |कवि समतल प्रदेश का रहने बाला है अतः ऐसे दृश्य का चाक्षुष विम्ब ग्रहण करने के साथ ही वह “देखा है “क्रिया का व्यावहार कर उठता है,जिससे उसके इस मेधदर्शन की वास्तविकता पूरी तरह स्थायी हो जाय |दूसरी ओर यह ‘देखा है ‘में आह्लाद के साथ-साथ सुखद आश्चर्य का भाव भी निहित है।
पर्वतीय प्रदेश में बादल छोटी-छोटी बूँदों में बरसता है |कवि कल्पना करता है की ये शीतल तुहिन कण मोती जैसे है |कवि ने इन्हे मानसरोवर में खिले हुए सुनहले कमलो पर गिरते देखा है बादल के साथ ही कवि ने तुंग-शिखर की झीलें दिखती है |यहाँ समतल देशो से उड़-उड़कर आने वाले हंस मृणाल तंतु खोजते हुए तैरते है | कवि इस परिवेश में चकवा-चकई और चकवा-चकई को भी देखता है |जो विरह निशा के बाद अभी-अभी मिले है और तलाव में शैवाल की बिछी चादर पर प्रणय-क्रीड़ा कर रहे है |कवि पर्वत की बर्फीली तलहटी में सौ हजार फुट की उचाई पर अपनी ही नाभि के परिमल वास से उन्मत्त तरुण मृग को अपने पर चिढ़ते देखता है| वह इस तुंग शिखर पर कुबेर और उसकी अलका और व्योमप्रवाही गंगाजल को भी खोजता है | वह उस मेघदूत को खोजता है, जिसे कालिदास ने संदेस पहुँचाने का दायित्व दिया था | पर, उसे इनमे से कोई नहीं मिल पाता है और उसे कालतिक्रमण का पहलू नहीं मानकर कवि-कल्पित जानकर इसे छोड़ने की बात करता है| कैलाश की चोटी पर छाये घिरे बादलों को देखकर कवी को प्रतीत होता है कि ये “महामेघ” झंझानिल के साथ गरज-गरज कर भीड़ रहे है | यहाँ कवि मेघ का मानवीकरण कर देता है तथा उसे वीर-भाव से अभिसिक्त रूप में उपस्थित करता है|
अंतिम चित्र के रूप में कवी सैकड़ों कल – निर्झर भरे देवदारु,जंगल में लाल, सफ़ेद भोजपत्रों से छाया कुटी के भीतर रंग विरंगे और सुगंधित फूलों से केश राशि का विन्यास करने वाली किन्नर- किन्नरियों को वंशीवादन करते हुए देखता है| इन किन्नरियों के सोंदर्य का कवि ने मनोरम वर्णन प्रस्तुत किया है | ये शंख जैसे सुधड़ गलों में इन्द्र नील की माला पहने हुए हैं | कानों में इन्होंने कुवलय डाल रखे हैं | इनकी वेणी में लाल कमल हैं | वे मृग छालों पर बैठी हैं | ऐसी उन्मद किन्नरियों के एक ओर वीणावादन हो रहा है और दूसरी ओर बदल घिर रहे हैं |
इस प्रकार सिद्धहस्त कवि ने यहाँ जिस सम्पूर्ण प्राकृतिक परिवेश का चित्रण प्रस्तुत किया है , उसके मूल में प्रकृति के प्रति उसका अदम्य प्रेमाकर्षण विद्यमान दिखता है इस कविता में अनुभाविक और आह्लाद- परक व्यक्ति संवेदना को नहीं समझाने के कारन आलोचकों ने जगह-जगह पर भूलें की हैं और आरोपित रूप में इसमें यथार्थ के स्वर ढूंढने की गलत चेष्टा की हैं| डॉ० परमानन्द श्रीवास्तव और डॉ० विश्वनाथ तिवारी ने लिखा है कि इस कविता में कवि “चित्रों” के यथाथा‌‌ॅनुभव से दृश्य बनाता है|” पर पूरी कविता यह बताती है कि कवि ने इसमें अपनी कल्पना का और रोमानी दृष्टि का उपयोग किया है।
अंतिम चरण में किन्नरियों के वंशीरव टेरने के चित्रण में रुमान बहुत स्पस्ट रूप में मुखर हुआ है | इस प्रकार, स्पष्ट है कि इस कविता में कवि का तथ्यगत चयन व्यष्टि चेतना के रूमानी सन्दर्भ का स्पष्ट गवाह है |
[घ] वेतवा किनारे:- इस कविता में वर्षा के बाद विखरी धूप का एक चित्र प्रस्तुत किया गया है, जिसमे कवि के अहसास को वाणी मिली है | कवि कहता है कि बदली के बाद बेतवा नदी के किनारे धूप खिलपडीं हैं |सर्दी का रूप निखर उठा है | इस धूप की उष्णता ने शिरा-शिरा में स्पंदन दौरा दिया है अहसास के इस बिन्दु पर इस क्षण विशेष में, जो प्रकृति इस बेला में संभव हो पाया है, वाणी बिल्कुल मौन हो गयी है| प्रकृति का सब कुछ भरा-परा है, राजा भी, विश्व के बहुत कुछ का स्वामी भी इस प्राकृतिक पूर्णता के सामने रंक है | यहाँ कविता का यह आनुभूतिक अभिव्यंजन नितान्त वैयक्तिक रूप में प्रस्तुत हुआ हैं|
“वेतवा किनारे” इस कविता में वेतवा नदी के किनारे की सौंदर्य-प्रभाव-परक आह्लादक अनुभूति का निरूपण किया गया है | कवि कहता है कि वेतवा के किनारे मान के मृदंग पर लहरों की थाप उठ रही है| गीत के संग पर गीतों में पुसपस हो रही है | कवि कहता है कि वेतवा के किनारे पिकनिक के रंग है | वेतवा के किनारे अंग-अंग पुलकित हो रहे हैं | इन पर मालिश फिजूल है|
इस प्रकार यहाँ वेतवा के सौंदर्य और तन दोनों को प्रभावित कर रहा है। पिकनिक और गीतों ने पुरे परिवेश को ही मादक बना दिया है| मन के मृदंग की मुखरता और अंग-अंग को पुलकाबुलता के विम्ब के मूल में स्पष्ट ही यहाँ नागार्जुन की व्यष्टि परक चेतना विद्यमान है|
(ङ) धूप में खिले पात:- कवि नागार्जुन को प्रकृति में एक ओर वर्षाप्रिया है तो दूसरी ओर वर्षा के बाद निकलने वाली वह धूप भी जिसमें वृक्षों,पादपों के पत्र धुल-पुछ कर निखर उठते हैं | इस कविता में वर्षान्त के बाद की निकली धूप का मनोरम चित्रांकन किया गया है | इसमें अनछुए पात धुले-धुले दीखते हैं | कल का फीकापन मिट गया हैं | आज ये निखर हो उठे हैं | कवि को यह धूप में जादू का प्रतीत होता है|
वह कहता है कि धूप के आकर्षण में पत्ते खिल उठते हैं | मस्त पवन का स्पर्श पाकर वे पुलकित हो उठते हैं हवा जब मस्ती में भरकर बहती है तब ये हिल हिल पड़ते हैं | ये जादू के सांचे में ढले लगते हैं | विगत ऋतु में दाह से भौ से मुक्त हो चुके हैं | कहना न होगा कि यहाँ भी कवि के व्यष्टिमन का मुग्धकर प्रभात ही रूपायित हुआ है।

डॉ0 छेदी साह

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2 Comments

  1. Dr. Chhedi sah June 15, 2017 at 11:29 pm

    धन्यवाद

    Rating: 3.0/5. From 1 vote. Show votes.
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  2. पुतुल कुमारी June 19, 2017 at 9:21 pm

    काफी रोचक तथ्य और ज्ञानवर्धक रचना नागार्जुन की प्रकृति कविता।।

    Rating: 4.3/5. From 2 votes. Show votes.
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