भाग्य लेख

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भाग्य लेख

By |2017-06-15T22:44:01+00:00June 15th, 2017|Categories: आलोचना|0 Comments

 

शिवानी बच्चों  को रात खाना खिला कर सुला चुकी थी और रणजीत के आने की प्रतीक्षा कर रही थी . दस बज चुके थे .शिवानी को भूख भी लग रही थी और गुस्सा भी आ रहा था की आखिर रणजीत ने रोज़ का यह नया सिलसिला क्या शुरू किया है पहले रोज़ाना आठ बजे घर लौट आने वाला रणजीत इन दोनों ग्यारह बारह बजे से पहले घर नहीं आता .उसका रवैय्या भी इन दिनी कुछ बदला बदला सा है .बस घर आकर थोड़ा बहुत खाया तो खाया नहीं तो यूँ ही सो जाता है शिवानी के कहने पर जवाब मिलता कि अब कौन सा खाने का टाइम है !! आजकल काम का बोझ इतना बढ़ गया है कि खाने पीने का भी समय नहीं मिलता .चाय पी-पी के ही पेट भर जाता है .बहुत नींद आ रही है आराम करना चाहता हूँ बस . शिवानी भी कभी कभार बिना खाये ही सो जाती थी . उसे रणजीत पर तरस आता था लेकिन साथ ही यह भी लगता था कि बिज़नेस बढ़ रहा है तो काम भी बढ़ेगा  ही. यही सोचते सोचते वह कब डाइनिंग टेबल पर ही सो गयी पता नहीं चला . अचानक फोन कि घंटी बजी तो वह हड़बड़ा क्र उठ गयी रणजीत का फोन था , ” कहाँ हो तुम ? रात के सवा ग्यारह बज रहे हैं घर नहीं आना क्या ? ”

” बोलना बंद करोगी तो कुछ बताऊंगा न , सुनो ! तुम खाना खा कर सो जाना लन्दन से क्लाइंट आये हुए हैं उनके साथ हूँ पता नहीं किस समय लौट पाउँगा. अगर ज़्यादा देर हो गयी तो यहीं होटल में रुक जाऊंगा ,तुम दरवाज़े बंद करो और आराम से सो जाओ .”

“ठीक है , ध्यान रखना अपना और अच्छा होगा कि इतनी रात को तुम न ही आओ तो सुबह आ जाना , बाय .” शिवानी ने फोन रखा और कहना उठा कर फ्रिज में रखने के बाद थोड़ा दूध पीकर सो गयी .

पहली बार ऐसा हुआ कि रणजीत रात को घर नहीं आया .

यह सिलसिला चलता ही रहा कभी देर से लौटना , कभी रात रात बाहर रहना शिवानी खाना टिफ़िन में दाल कर देती तो वह भी कभी कभी वापस ही आ जाता था . काफी दिन बीत गए शिवानी यही सोचती रही कि रणजीत अपने काम में व्यस्त है बिज़नेसमैन को कहाँ समय मिलता है परिवार के साथ बिताने के लिए .

शिवानी को कल अपनी फ्रेंड्ज़ के साथ किटी पार्टी में जाना है रात से ही तैयारी में लग गयी नयी साड़ी और उसके साथ मैचिंग डायमंड का सेट निकल कर अलग रख दिया अलमारी में सैंडल हैंडबैग सब कुछ निकाल कर रखा और पार्टी के रोमांच के साथ ही सो गयी रणजीत और बच्चे पहले ही सो चुके थे . अगले ईडन सुबह बच्चों को स्कूल भेज कर रणजीत को भी ऑफिस भेज दिया और फिर लग गयी सबके साथ फोन पर बात करने और जाने कि प्लानिंग करने.  ख़ुशी- ख़ुशी होटल पहुंची . कार से उतरी तो सामने जो देखा उसे देख कर आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ. रणजीत नीला के साथ हाथ में हाथ डाले अपनी गाडी कि और जा रहा था .शिवानी कि साँस  जहाँ थी वहीँ रुक सी गयी .बस यही सोच रही थी कि उसकी किसी सहेली कि नज़र न पद जाये उस पर .रणजीत गाडी में बैठ कर चला गया .लेकिन शिवानी का फिर पार्टी में मन नहीं लगा और वः ख़राब तबियत का बहाना बना कर वहां से जल्दी लौट आयी .

अब शिवानी दिनभर यही सोचती रही कि आज रणजीत से सारा हिसाब करेगी कि भला कौन से बिज़नेस में व्यस्त है वह .शाम हो आयी थी सोचते- सोचते . संचित और अर्पित कि ट्यूशन टीचर आ गयी थी उन्हें पढ़ने बैठा कर शिवानी चाय बनाने चली गयी अचानक उसके दिमाग में एक विचार आया कि क्यों न रणजीत को  रंगे हाथ पकड़ा जाये . अब उसने सोचा कि क्या किया जाये कि उसकी हर हरकत पर वह नज़र रख सके .  खैर  रात हुई लेकिन आज रणजीत समय पर घर आ  चुका था.खाने कि टेबल पर शिवानी ने पूछ ही लिया , “आज दिन में एक बजे कहाँ थे ? ”

कहाँ था मतलब ? ऑफिस में था और क्या ? यह सुन कर शिवानी ने घमाने फिराने कि बजाय सीधा सवाल किया

“और नीला कहाँ थी ? ”

रणजीत के चेहरे का रंग उड़ गया ….. वह समझ  चुका था कि ज़रूर शिवानी ने उन दोनों को साथ देख लिया है – “ओह  ! हाँ , याद आया आज तो क्लाइंट के साथ रेडिसन गए थे  . क्यों ? क्या हुआ  ”

मुझे बेवक़ूफ़  बनाने की कोशिश मत करो तुम रणजीत मुझे सच सच बताओ कि आखिर चल क्या रहा है तुम दोनों के बीच . ” रणजीत ने बच्चों कि तरफ देखा और कहा , “बच्चों के सामने क्या बकवास कर रही हो शिवानी ? “अगर कहीं से सुना होता तो  विश्वास न होता लेकिन खुद देखा है मैंने तुम्हे उसकी बाहों में बाहें डाले घुमते हुए और बच्चों कि बात मत करो बच्चे इतने भी छोटे नहीं हैं सब समझते हैं ये  ” न चाहते हुए भी शिवानी कि आँखों में आंसू आ गए . रणजीत ने गुस्से में खाना छोड़ दिया और सोने चला गया .

वह दिन था और आज का दिन घर में जैसे अशांति और कलह ने अपने पाँव जमा लिए थे . रोज़ के झगडे ैरोज़ कि चीख चिल्लाहट . रणजीत ने कभी इस बात को नहीं मन कि उसके नीला के साथ नाजायज़ सम्बन्ध  हैं .

अब शिवानी के पास कोई  चारा  न रहा उसने सोचा कि कोई प्राइवेट डिटेक्टिव हायर किया जाये . उसने इंटरनेट पर तलाश कर एक डिटेक्टिव से बात कि . उसने प्राइवेट डिटेक्टिव हायर किया और उन दोनों के खिलाफ सबूत जुटा लिए . रणजीत कि करतूत देखकर शिवानी को गुस्सा कम आया और दुःख ज़्यादा हुआ . रात को जब रणजीत घर लौटा तो  खाना खाने के बाद अपने कमरे में शिवानी ने  सारे फोटोग्राफ रणजीत के सामने पटक दिए  . रणजीत के पास अब कोई चारा नहीं था , लेकिन उसकी आँखों पर बेशर्मी का पर्दा  पड़ा  हुआ था  . उसने बहस करना ठीक नहीं समझा और न ही गुस्सा किया केवल इतना ही कहा ,” अब जब तुमने सब पता लगा ही लिया है तो हमारे रिश्ते को और ढोना बेकार है . अच्छा होगा कि हम अलग रह कर ही अपनी -अपनी ज़िन्दगी जियें .”

शिवानी पर मानो बिजली गिर पड़ी हो उसे ऐसा लग रहा था कि काश ! यह धरती फट जाए और वह उसमे समां जाये .एक ही पल में उसे पराया कर दिया था रणजीत ने वह सोच रही थी कि  कैसे एक पुरुष अपने परिवार को छोड़ने कि बात कर सकता है आज पंद्रह साल का रिश्ता खत्म करने में पंद्रह मिनट भी न लगे उसे रोते -रोते उसका गला फटने को हो रहा था बेचारे बच्चे सहमे हुए सब देख रहे थे  . अर्पित संचित भी रोने लगे और माँ बेटे एक दुसरे  के आंसू पोंछने लगे

शिवानी को कुछ न सूझ रहा था रणजीत के मुंह से इतनी बड़ी बात सुन कर भी वह कैसे ज़िंदा है यही सोच रही थी उसने बच्चों का मुंह देखकर अपने आप को जैसे तैसे संभाला और बच्चों के साथ उन्ही के कमरे में सोने चली गयी . बच्चे तो बच्चे थे थोड़ी देर बाद सो गए लेकिन शिवानी की आँखों से नींद कोसों दूर थी .वो सारी रात यही सोचती रही की आदमी कितना निर्मोही होता है अपने मतलब के लिए कैसे अपनी पत्नी अपने बच्चे अपना घर सब कुछ छोड़ने की सोच सकता है . भगवान् ने औरत को ही क्यों इतना भौक बनाया की वः अपने घर और पति के आलावा कुछ सोच ही नहीं पाती . शायद इसलिए की वह एक माँ भी होती है . उसने निश्चय कर लिया था की वह अकेली ही अपने बच्चो की देखभाल करेगी और जाने देगी रणजीत को उसकी खुशियों की ओर .

उसने सुबह होते ही रणजीत को उठाया और बोली , ” बताओ रणजीत अब क्या करना है ? घर छोड़ कर मुझे जाना है या तुम जा रहे हो  ? ”

रणजीत को इतने सपाट सवाल की उम्मीद नहीं थी .वह सकपका सा गया और बोला.

” करते हैं बात , आँख तो खुलने दो. ”

“नहीं, अब और नहीं ,मुझे अभी जवाब चाहिए ”

“तो ठीक है , तुम यहीं रहो तुम्हे कहीं जाने की कोई ज़रुरत नहीं है . मई ही चला जाता हूँ .”

रणजीत उठा  और रोज़ की तरह तैयार होकर नाश्ता करने बैठा जैसे कुछ हुआ ही न हो लेकिन शिवानी ने कुछ नहीं बनाया था रणजीत ने एक सेब उठा कर खाना शुरू किया और बोला ,

,” देखो जो हुआ सो हुआ लेकिन मई तुम्हे और बच्चों को किसी परेशानी में नहीं डालना चाहता प्रॉपर्टी बैंक बैलेंस तुम्हारे नाम के शेयर सब तुम्हारा है क्रेडिट कार्ड्स हैं तुम्हारे पास मैं आता रहूँगा बच्चों से मिलने . कोई भी परेशानी हो तो मुझे फोन कर सकती हो बिलकुलपहले की तरह . फर्क सिर्फ इतना है की अब मैं यहाँ नहीं रहूँगा ”

यह सुनते ही शिवानी फूट फूट के रो पड़ी .उससे कुछ बोलते नहीं बना और  रणजीत उसे रोटा छोड़कर चला गया . वह चुपचाप अपनी ज़िन्दगी को जाते देख रही थी और सोच रही थी की कैसे रहेगी वो रणजीत के बिना !!!

दिन कटे, हफ्ते ,महीने और साल ज़िन्दगी यूँ ही चलती रही . रणजीत कभी कभी आता बच्चों से मिलने .अब धीरे धीरे शिवानी का मोह भी छूट रहा था और वह ऐसे ही जीना सीख चुकी थी .

 

 

तीन साल बीत चुके थे . एकदिन जब दरवाज़े की घंटी बजी और उसने दरवाज़ा खोला तो वह रणजीत को देख कर थोड़ी हैरान हुई क्योंकि यह उसके आने का समय नहीं था वह बच्चों से मिलने शाम के समय ही आता था .

“अभी बच्चे घर पर नहीं हैं ”

जनता हूँ शिवानी ,लेकिन आज मैं तुमसे मिलने आया हूँ ”

“क्यों ? आज मुझसे मिलने की क्या ज़रुरत आ पड़ी  ? ”

शिवानी बैठ कर बात करें ?

शिवानी अंदर चली आयी वह बहुत आहात हो चुकी थी बीते समय की बातों से , “बोली कहो , क्या कहना चाहते हो ? ”

रणजीत शिवानी के पैरो में गिर पड़ा , ” शिवानी मुझे माफ़ कर दो ”

शिवानी हैरान थी रणजीत के पास से हट कर बोली , “क्या बात है साफ़ साफ़ कहो ”

मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गयी शिवानी , मैं बहुत देर में समझा की नीला को सिर्फ मेरे पैसे से प्यार था , उसने मेरेम बिज़नेस पर भी हाथ साफ़ करने की कोशिश की लेकिन मुझे समय पर पता लग गया . शिवानी मैं जनता हूँ की मेरी भूल माफ़ी के काबिल नहीं है , लेकिन तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है शिवानी .मुझे एक मौका दे दो मैं दोबारा ऐसी हरकत कभी नहीं करूंगा ”

मुझे सोचने लका मौका दो रणजीत

नहीं शिवानी अब मैं यहाँ से जाने के लिए नहीं आया .

शिवानी चाहकर भी न नहीं कर सकी और एक बार फजिर दोनों साथ आ गए . धीरे धीरे ही नार्मल होता सब कुछ . शिवानी खुद को संभल नहीं प् रही थी . रणजीत कोशिश करता रहा उसे मनाने की..

यह देखो शिवानी , हम इस बार अपने सेकंड हनीमून पे ऑस्ट्रेलिया जा रहे हैं ”

रणजीत ने टिकट दिखते हुए कहा .

छोडो बच्चे बड़े हो गए हैं अब कैसा हनीमून  !!

अरे बच्चे दादी के साथ रहेंगे मैंने माँ को बुलवा लिया है तुम तैयारी करो चलने की .

अनमनी शिवानी को जाना पड़ा .

पंद्रह दिन के लिए ऑस्ट्रेलिया में उन्होंने खुद को समय दिया . वहां की फोटोग्राफ्स भी फेसबुक पे डालीं सब खुश थे की उनका घर दोबारा से बस गया है .

वापस लौटते समय दोनों काफी खुश थे .

बच्चे मम्मी पापा के लौटने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे लेकिन आयी तो बस एक खबर की दोनों की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गयी.

घर में मातम  पसर  गया .जिसने सुना वह हैरान रह गया .

शायद उनका दोबारा मिलना सिर्फ साथ मरने के लिए ही हुआ था . विधि का विधान कौन समझ पाया है भला . शायद इतना ही साथलिखा था उनके भाग्य में .शायद यही था भाग्य लेख .

साथ जीना नहीं साथ मरना लिखा था तकदीर में !!!

मंजू सिंह 

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About the Author:

बीस वर्षों तक हिन्दी अध्यापन किया । अध्यापन के साथ शौकिया तौर पर थोडा बहुत लेखन कार्य भी करती रही । उझे सामजिक और पारिवारिक इश्यों पर कविता कहानी लेख आदि लिखना बेहद पसन्द है।

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