शिकारगाह

जंगल में चुनाव के मद्देनजर वनराज अपने प्रचार-प्रसार में तनिक मशगूल क्या हो गए, भेड़िये ने खुद को ही जंगल का राजा मानना शुरू कर दिया। जंगल में खुद को अघोषित रूप से राजा मान लेने के बाद भेड़िया अपने सहयोगी के रूप में सियार एवं लोमड़ी को भी अपने साथ कर लिया।

सियार जहाँ लोमड़ी के द्वारा फँसाकर लाये गये शिकार का लेखा-जोखा रखने लगा तथा ये तय करने लगा था कि किस शिकार का कौन-सा हिस्सा और कितना हिस्सा खाना है, वहीं उनमें से कुछ हिस्सा वह अपने लिए भी तय करने लगा था।

जबकि लोमड़ी का कार्य हो गया था – पूरे जंगल में घूम-घूमकर अन्य जानवरों से रिश्ते बनाना, दोस्ती गाँठना और जो जानवर उसकी चाल या जाल में न फँस सके, उनके बीच लकड़बग्घे, हुँड़ार या वनबिलाव आदि को जयचंद और मीरज़ाफर के रूप में भेज देना ताकि वे उनके विश्वासपात्र बनकर उनके बारे में गोपनीय जानकारी एकत्र कर सकें या उनकी योजनाएँ जान सकें या उनके बीच हो रही काम की बातों को रेकॉर्ड करके उसके पास ला सकें और तब वह उसे भेड़िया और सियार के पास पहुँचाकर मनोवांछित ईनाम पा सके या उनका विश्वासपात्र बनकर किसी ऊँचे ओहदे पर पहुँच सके। इसके साथ ही वह अन्य निरीह पशुओं के बीच अपना रौब भी गाँठ सके।

भेड़िया, सियार और लोमड़ी के लिए सबकुछ अनुकूल चल रहा1 था, प्रतिकूलता उनके लिए केवल हाथी, चिम्पांजी, गोरिल्ला, गौरैया एवं मैना उत्पन्न कर रही थीं। ये पाँचों न केवल खुद ही इन हिंसक जानवरों के झाँसे में आ रहे थे बल्कि दूसरे अहिंसक जानवरों को भी सचेत एवं आगाह कर रहे थे।

स्थिति जब भयावह हो गई और इन पाँचों के प्रयास से जब एक भी निरीह पशु उन तीनों हिंसक पशुओं के पास नहीं जाने लगे तब वे तीनों इस बात को लेकर काफी चिंतित हो गये कि कहीं उन्हें अपनी प्रकृति छोड़कर घास-फूस खाकर गुजारा न करना पड़ जाए।

वो कहते हैं न कि ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’, सो लोमड़ी जब हाथी और चिम्पांजी का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकी तो गोरिल्ला, गौरैया एवं मैना को अपने निशाने ले ली। उसने गौरैया और मैना पर ये अभियोग लगवा दी कि “इन दोनों ने जंगल का सदस्य रहते हुए गाँव एवं शहर जाकर मनुष्य की संगति कर ली है तथा इस तरह से जंगल के नियम का उल्लंघन की हैं ।”

जबकि, गोरिल्ला पर वह कोई आरोप मढ़ने में सफल नहीं हो सकी। अपनी इस असफलता पर झुँझलाकर उसने भेड़िया और सियार के साथ एक गुप्त बैठक की और गोरिल्ला के पूरी तरह से निर्दोष रहने के बावजूद भेड़िया ने उस पर ये आरोप मढ़ दिया कि “मुझे मेरी आँखों से आखिर तुम नजर क्यों नहीं आते हो?”

इस प्रश्न के उत्तर में निर्दोष गोरिल्ला ने बड़ी विनम्रता से यही कहा कि, “महोदय, आपको लकड़बग्घे, हुँड़ार, वनबिलाव, साँप, बिच्छू आदि सभी दिखाई देते हैं क्योंकि उस समय आपकी आँखें सामान्य रहती हैं जबकि मेरे जैसे अहिंसक प्राणी का नाम सुनते ही आपका दिमाग कुंद हो जाता है, जीभ से लार टपकने लगती है और आपकी आँखों में खून उतर आता है इसलिए आपकी आँखों से मैं नजर नहीं आ पाता हूँ।

हाँ, आप मुझे सियार जी एवं लोमड़ी मैडम की आँखों से देखें तो मैं आपको साफ-साफ नजर आने लगूँगा।”

इस पर भेड़िये ने कहा कि, “ठीक है, तब तुम सियार और लोमड़ी को खुश कर दो…मैं खुद ही खुश हो जाऊँगा।”

‘सच्चाई में ताकत होती है’, गोरिल्ला अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार एवं विचारों से निहायत ही सच्चा था इसलिए उसने उसके इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए पूरी तरह से निर्भय होकर भेड़िया को ये जवाब दे दिया, “क्षमा कीजिये, मैं अपने कार्यों के प्रति उत्तरदायी हूँ न कि किसी को खुश करने के लिए नियुक्त हूँ।”

फिर क्या था, लोग कहते हैं कि जंगल के अन्य जानवर कुछ ‘लेन-देन’ करके अपने ऊपर लगे आरोपों से बरी हो गये लेकिन अन्य हिंसक पशुओं के साथ-साथ भेड़िया, सियार और लोमड़ी के द्वारा उस जंगल को पूरी तरह से शिकारगाह बना दिये जा चुकने के बाद वह गोरिल्ला, गौरैया और मैना आज भी दोषी हैं और निर्दोष रहने के बावजूद दोषी होने की सजा पा रहे हैं…

डॉ. गोपाल निर्दोष

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