क्यों काटे वो आंसू जो बोये पसीना ,

क्यों होता है मुश्किल सदा उसका जीना  |

वो सहता है मौसम की हर मार को भी

वो झेले है महंगाई के वार को भी ,

फसल का सही मोल उसको मिले ना

,रहे फिर भी हरदम ताने वो सीना |

है कहने को वो अन्नदाता हमारा ,

नहीं है मगर कोई उसका सहारा ,

है कर्ज़े मे डूबा वो पाँव से सर तक ,

भंवर में फंसा है क्यों उसका सफीना .

मरे खुद वो भूखा जो जग को खिलाता ,

कभी मिल ना पावे जो है मन को भाता ,

न सर पे ही पक्की कभी छत वो पाता,

कटे भारी  मुश्किल में सावन महीना |

वो सर्दी की रातें ठिठुरते गुज़ारे ,

वो गर्मी में दिनभर बहाये पसीना ,

कोई तो खबर लो अब उसकी भी देखो,

कि वो आत्महत्या कर ले कहीं ना ,

क्यों काटे वो आंसू , जो बोये पसीना ???

– मंजु सिंह

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