कुछ पल
ज़िंदगी की किताब से
कुछ पल ख़ुशियों के चुरा लूँ
ये लम्हे ना जाने कब बीत जाए
कुछ पल तो हँस लूँ गा लूँ
अश्क़ों से अलहदा ये ज़िंदगी नहीं
ख़ुशियाँ और ग़म से जुदा ये ज़िंदगी नहीं
तन्हाई में तो रोज ही जीते हैं
आज तो कोई महफ़िल सज़ा लूँ
आज जो अपने हैं
ना जाने कब बेगाने हो जाए
ज़िंदगी की ये हक़ीक़त
ना जाने कब अफ़साने हो जाए
कल शायद किसी चेहरे को ना देख पाऊँ
आज तो उसे निगाहों में बसा लूँ
ज़िंदगी की सेज-संध्या पर
ना जाने कब पहुँच जाऊँ
ना जाने कब एक अहसास बन कर रह जाऊँ
अरमानों के क़त्ल तो रोज ही होते हैं
आज की रात तो इस दिल को बहला लूँ
कुछ पल ख़ुशियों के चुरा लूँ
सरिता सोनी
गुवाहटी

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