जाने कहाँ अपना गाँव खो गया

वो चिड़ियों की चहचहाहट और
कौओं का कांव-कांव खो गया
कंक्रीटों के जंगल में ‘निर्दोष’,
जाने कहाँ अपना गाँव खो गया

अब न कहीं मिलती है दोस्तों,
वो बरसात की रपटीली राहें
वो बच्चों के खेल का मैदान,
और बरगद का छाँव खो गया

ढेले मारने को अमरूदों के बाग
या आम की अमराई न रही
वो मछलीवाली तलैया और,
पीपल-तल का ठांव खो गया

मुनिया की लुका-छिपी और
राजू-सोनू का चोर-सिपाही
भरी दुपहरी का गिल्ली-डंडा,
पहलवान का दांव खो गया

अब तो हाय-बाय की भाई,
देखो आई परंपरा निराली है
बड़ों के सम्मान में झुकी कमर
व सम्मानजनक पांव खो गया

बूढ़े रहीम न अब दादा कहलाते
और न दोस्त की माँ चाची
आधुनिकता के इस दौर में कहीं
अपनेपन का भाव खो गया

वो चिड़ियों की चहचहाहट और
कौओं का कांव-कांव खो गया
कंक्रीटों के जंगल में ‘निर्दोष’,
जाने कहाँ अपना गाँव खो गया

– डॉ. गोपाल निर्दोष

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