प्रगति कि प्रकृति

प्रगति मैं देखूं

प्रगति ही देखूं

यह क्या है

कि प्रकृति न देखूं

पहाड़ न देखूं?

नदी न देखूं?

तालाब न देखूं?

जंगल न देखूं?

गली-मुहल्लों में

पेड़ न देखूं?

गांवों में

जोते-बोये खेत न देखूं?

प्रगति ही देखूं

तो क्या देखूं

महाग़रीब की?

– केशव शरण 

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu