अब दिल्ली में डर लगता है

अब दिल्ली में डर लगता है

By |2017-06-21T00:44:46+00:00June 21st, 2017|Categories: समीक्षा|Tags: |1 Comment

किताबों में से एक अजीब सी खुशबू आती है। नई-नई किताबों की यह सुगंध बहुत भाती है मुझको। इस ईबुक वाले समय में उस एहसास के स्वाद को चखने का बहुत कम ही अवसर मिल पाता है , जमाना भी बदल चुका है और थोड़े हम भी । “अब दिल्ली में डर लगता है” ने फिर से उस खूबसूरत सी खुशबू को पहचानने का एक अवसर दिया । श्री अनिल कुमार मिश्र के कविताओं के इस संकलन की भी इतर एक भीनी सी खुशबू है।

बगिया में जैसे अनेक फूल होते हैं ,इस संकलन में भी बहुत से भाव है । प्रेम भी है, रोष भी है दुख भी और सुख भी।देशभक्ति भी ,समाज निर्माण का संकल्प भी । जैसे जीवन होता है वैसीे ही कविताएं भी। बीच-बीच में हास्य व्यंग भी है, कहीं प्रेरणादायक पंक्तियां भी|

और जब मच्छर, पूंछ बनाम मूंछ ,कुकुर-महाधिवेशन, सुंदर बंदर जैसे शीर्शक हों तो उत्सुकतावश सबसे पहले वही पृष्ठ सूंघे गये हैं| बढ़िया खुशबू थी | हम अपने इर्द-गिर्द की चीजों को किस नजर से देखते हैं और किस भाव से ग्रहण करते हैं ,ये हमारे हमारी प्रकृति से संबंध को दर्शाता है | मानव की मानवता शायद इस विश्व ब्रम्हांड में सबसे सुंदर कृति है पर कई जगह हम पशु की पशुता से भी नीचे हैं|कुछ कविताओं को पढ़कर इस सत्यता का अनुभव हुआ|और कुछ कविताओं में कवि उन बेजुबानों की जुबान बने हैं | कहीं गीत है ,संगीत भी | शनिवार की रात,चेहरा ,रिश्तो की अस्थियां जैसी कविताएं दो-तीन बार पढ़ने में मजा आया |श्रीमान जी (मैं तो जी लगाऊंग ही) के ‘अनुत्तीर्ण’ को पढ़कर एक अलग अनुभव हुआ| सोचा यह कविता हर उस साथी को पढाऊं जो परीक्षा की रेडक्लिफ लाइन के इस पार ही ठिठक जाते हैं और गुस्सें में आकर Pass marks नहीं देने वाले शिक्षक के प्रति कभी-कभी अज्ञानतावश नेगेटिव भाव को घर कर लेते हैं |’अनुत्तीर्ण’ की आखिरी पंक्तियां हैं- “मैं खुद अपनी ही कलम से पुनः अनुत्तीर्ण हो जाता हूं”|हर उस छात्र को एक बार यह पढ़ना चाहिए जिसने अपने फेल होने का दोष नंबर देने वाले के मत्थे मढ़ा है |कुछ कविताओं से खुद को जोड़ नहीं पाया, तद्भव रूप में कहूं तो कुछ बाउंसर भी थे |कुछ राष्ट्रहित और समाज निर्माण की कविताएं भी हैं जो प्रेरित करती हैं | कुछ पंक्तियां संस्कारो का सृजन करती हैं | ‘ठूंठ खूंटा’ की ये पंक्तियां मुझे इतनी भायी कि अपनी डायरी में नोट करने से खुद को रोक न पाया – “मुझे नहीं है आस किसी से,चाह नहीं सींचा जाऊं,दीमक जो मुझको चाट रहे,इच्छा है इनकी भूख मिटाऊँ ” |

इधर हाल के कुछ दिनों पहले मैं साहित्य के ‘हित के साथ’ वाले भाव से ओतप्रोत रह रहा हूं|महान दार्शनिक श्री प्रभात रंजन सरकार की यह बात ‘Art for Service and Blessedness’ ने मुझे बहुत प्रभावित किया है | ‘Art for arts sake’ में उतना दायित्वबोध नहीं है |साहित्य समाज का दर्पण होता है, दर्पण ही नहीं Torch भी होता है|इस संकलन में कई कविताएं ऐसी हैं जो समाज का चेहरे पर चेहरे वाला चेहरा दिखलाती हैं, लोगों के बदलते स्वरुप और आसपास की विडंबनाओं को चिन्हित करती हैं ,आदमी से त्रस्त आदमी, छल कपट अधर्म और समाज की वर्तमान परिस्थितियां जो नैतिक मूल्यों को रौंदते हुए मानव मनीषा को एक पल सोचने को मजबूर कर देतीे हैं कि वह करें तो क्या करे ! अधर्म का साथ दे सुख भोगे या धर्म के कांटो वाली राह पर चलता हुआ सांसे गिनें ! रिश्तो की अस्तियों को गंगा में बहा कर जब कवि ‘आगे तो जाना ही होगा’ कहते हैं तो मैं भी मन ही मन कहता हूं ‘कभी नहीं यह सावन बीते’ | गंगा से याद आया …जब जब भी कॉलेज से समय बचा कर गंगा किनारे बैठता हूं तो गंगा बड़ी शांत सी मालूम पड़ती है |एकदम स्थिर | लेकिन ‘अनुभव’ वाले नाविक बताते हैं कि अंदर ही अंदर गंगा की धार बड़ी तेज होती है ,बात ‘गांठ’ बाधे रखियेगा,और संभल कर रहियेगा ,साथ ही कुछ निर्देश भी देते हैं | नाविक को साधुवाद |हरी कलम को हरि की कलम मानने वाला व्यक्ति जब आशीष देते हुए कहता है ‘जियो तुम शेर हो …तुम्हें जाना है काफी दूर थककर उफ्फ नहीं करना ‘ तो चरण स्पर्श कर सके ऐसे शब्द नहीं मिलते |

मेरा मानना है कोई वक्त बेवक्त यूं ही कविताएं नहीं लिखता | भीतर की हलचल जब कलम का साथ पाती है तो कोरी कागज को रंगीन कर जाती है |अलग-अलग आकार-प्रकार ,रंग-रूप ,अलग-अलग विधाएं ,अलग-अलग अंदाज़ अलग-अलग भाव और कभी अलग-अलग उद्देश्य |आधुनिकीकरण के पहिए ने सबके लिए समय की सीमाएं तय कर दी हैं| कई बार हम नयेपन को पसंद नहीं करते, कई जगहों पर नए से ज्यादा अच्छी पुरानी चीजों की अासक्ति हो दाती है|पर चलना ही तो जीवन है |जमे कि मरे | किताबें तो सदा ही अच्छी दोस्त होती है | और नए नए दोस्त बनाना सेहत के लिए अच्छा होता है |

“अब दिल्ली में डर लगता है” पढकर एक सुखद अनुभव हुआ |आप भी पढें ,एक साथ बहुत से तार झंकृत हो जायेंगे |संवेदनाओं के तार का झंकृत होते रहना शुभ संकेत है | यह एहसास दिलाता है कि आप जिंदा है |भवानी प्रसाद मिश्र ने कहा है- “कुछ लिखकर सो ,कुछ पढ़कर सो तू ,जिस जगह जागा सवेरे, उस जगह से बढ़ के सो तू” |

“अब दिल्ली में डर लगता है”(उन्वान प्रकाशन) को अनंत शुभकामनाएं और कलम को मेरा प्रणाम..!

– वरुण कुमार 

Comments

comments

Rating: 1.5/5. From 2 votes. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  • 1
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    1
    Share

About the Author:

One Comment

  1. अनिल मिश्र June 25, 2017 at 8:41 pm

    उत्कृष्ट समीक्षा!
    समीक्षक को एवं हिंदी लेखक डॉट कॉम को हार्दिक बधाई एवं असीमित शुभकामनाएँ!

    Rating: 1.5/5. From 2 votes. Show votes.
    Please wait...

Leave A Comment