मैं भिखारी हूँ

मैं भिखारी हूँ
लोग कहते हैं
मैं भिखारी हूँ
दिखता तो हुबहू
इंसानो सा हूँ
लेकिन होगा कुछ फ़र्क़
मैं सो जाता हूँ
कहीं भी फूटपाथ पे
या घावों से सड़े गले
किसी कुत्ते की बग़ल में
मैं भिखारी हूँ
इसीलिए सब आते जाते
देखते है बड़ी हैरत से मुझे
शायद में इंसानों की
दुनिया से नहीं हूँ
इसीलिए नहीं सुहाता
किसी कोने में पड़ा
इत्मिनान से सोया
मार जाते है ठोकर
आते जाते सभी
या बन जाता हूँ
तमशाई उन आवारा
गली में खेलते बच्चों का
मैं एक भिखारी हूँ
दूर से निहारा करता हूँ
शीशे के आशियाने को
बेसुध हँसता हूँ देख
फेंके जाते पकवानों को
छीन कर खाना नहीं गवारा
पर माँग कर खाना
कब लगता है प्यारा
पेट की आग सताई थी
बस भूख की लड़ाई थी
ना फैलाता हाथ में
शाम की चिंता जलाई थी
हाँ मैं भिखारी हूँ
मैं भिखारी हूँ
पर मैं यूँ ही नहीं
बन गया भिखारी
मुझे भी खिंचते है
इंसानो से ऐशोआराम
पर इंसानियत ही
शायद बाक़ी नहीं उनमें
फिर इन सबका क्या काम
ख़ुश हूँ बहुत
दो वक़्त की खाकर
दूर हूँ तुम्हारे
इन सियासी खेलों से
परे हु तुम्हारे
पाप पुण्यों से
मस्त हूँ अपनी बेफ़िक्री में
क्योंकि मैं एक भिखारी हूँ
मैं एक भिखारी हूँ


सरिता सोनी
गुवाहाटी

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