जिन्दगी

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 जिन्दगी

By |2017-06-22T22:53:52+00:00June 22nd, 2017|Categories: गीत-ग़ज़ल|Tags: |0 Comments

हर पल में ही ये बदल जाती है,

जाने कितने ही रंग ये दिखाती है |

जो अभी अभी सुनहली सी लगे,

कि तभी वो साँवली हो जाती है ।

जन्नत के ऐश जो नजर आते कभी,

कभी वो जहन्नुम सी नजर आती है ।

लगे निहायत से लोग लगे अपने जो,

रिश्ते वही परायों में बदल जाती है ।

अरमान की जो कली खिलती कभी,

कभी टूट कर  वो ही बिख़र  जाती है ।

पैसों की खनक से उपजे रिश्ते जग में,

पैसों के साथ ही वो दफन हो जाती है ।

राख का ढेर है सुन्दर सी काया प्राणी,

फिर ये क्यों अभिमान में खो जाती है ।

तिनका भी संग नहीं जाता गर हमारे,

दौलत पाने को क्या-क्या कर जाती है।

जिन्दगी चार दिन की मेहमान है बस,

फिर भी क्यों ये जीती न जीने देती है ।

खुशियों की खुशबू से भर दे ये दुनिया ,

फिर तड़पा करके ही क्यों खुश होती है।

इंसा इंसानियत सब समान है जग में,

इंसा के नियंता को क्यों बाँट देती है ।

-डॉ. सरला सिंह

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