नवराग

धड़कन में नवराग बसा है…

धुन धैवत ये नवल निराली….

प्रेम राग से हृदय बजा है

निर्मल कोमल मन मंजरी पर..

प्रेमकमल सा पुष्प खिला है….

जो भी था हे प्रियवर मेरा….

सकल सर्वस्व तुम्हारा हुआ  है…

क्या बचा है मुझमें मेरा

हृदयांकुर अब हरा हुआ है….

सूना शून्य रीता था जीवन

तुमने नव संसार रचा है…

कोरे से एहसास थे मेरे

तुमने प्रीत के रंग रंगा है…

बुनता हूँ अब ख्वाब सुनहरे…

कठौत मैं और तू गंगा है।

-दीपचंद महावर “शादाब”

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