सबक तहज़ीब वाले अब किताबों में नहीं मिलते।

नफ़े नुक़सान के ख़ालिस हिसाबों में नहीं मिलते।

सरे बाज़ार   फिरते   हैं,  तमंचे   हाथ  में  लेकर;

गुनाहों  के खिलाड़ी  अब नक़ाबो में नहीं मिलते।

बड़ी  रफ़्तार  में   हैं   लोग, उड़ने  पर  उतारू  हैं;

कि पंजे  घुड़सवारों के, रक़ाबों  में  नहीं मिलते।

खुदा  के  नूर   से   हैं  बेटियों   के चेहरे  रोशन;

बरसते   नूर  ऐसे,  आफ़ताबों  में  नहीं  मिलते।

तलब ‘बृजराज’ को क्यूँ हो, किसी भी दूसरी मय की;

नशे  तेरी  निगाहों  के, शराबों  में  नहीं  मिलते।

–बृज राज किशोर

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