भ्रस्टाचार

मैं गया सिनेमाहाॅल ।
वहाँ का देखा मैंने माहौल ।।
चूँकि हम पहुँचे लेट ।
बंद हो गए टिकट काउंटर के गेट ।।
मन ही मन हम निराश हो गए ।
जब विफल हमारे प्रयास हो गए ।।
तभी एक व्यक्ति मिला मुझे,
शक्ल से थोड़ा अनाड़ी था ।
पर वही टिकट का जुगाड़ी था ।।
मैंने उसे अपनी समस्या बताई ।
उसने कहा चिंता मत कर मेरे भाई ।।
उसने फौरन अपना जेब टटोला ।
और टिकट का भंडार खोला ।।
और मुझे देखकर बोला ।
क्यों भाया अब टिकट चाहिए ,
मैंने कहा जी लाइए ।
और दाम भी बताइए ।।
उसने टिकट का दाम ,
तीन गुना बढ़ाकर बताया ।
मैं सुनकर चकराया ।।
मजे के चक्कर में कहो या मजबूरी में ,
हम उसे पैसे देकर आए ।
और मंद मंद मुस्काए ।।
घर आकार हमें अफसोस हुआ ।
अपनी करनी का सोस हुआ ।।
क्योंकि जो उसने किया वो ,
कालाबाजार था ।
और जो हमने किया ,
वो भ्रष्टाचार था ।।
इसलिए पहले स्वयं को सुधारें ।
फिर भ्रष्टाचार रोकने की बात करें ।।

– नवीन कुमार जैन

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