पीते हैं …

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पीते हैं …

By |2017-06-25T10:36:09+00:00June 22nd, 2017|Categories: कविता|0 Comments
पीते हैं …
 
सब
कुछ न कुछ
पीते हैं //
 
रजनी
सांझ को
पी जाती है
और सहर
रजनी को
फिर सांझ
सहर को
सच
सब
कुछ न कुछ
पीते हैं //
 
अंत
आदि को
पंथ
पथिक को
संत
अनंत को
घाव
भाव को
सच
सब
कुछ न कुछ
पीते हैं //
 
नयन
नीर को
नीर
पीड़ को
समय
प्राचीर को
सरोवर
तीर को
सच
सब
कुछ न कुछ
पीते हैं //
 
जीवन
कहाँ मधुबन है
थोड़ी खुशी
बेअंत
क्रंदन है
कंटकित राहें है
प्रणय की बस्ती में
अश्क और आहें हैं
रिश्ते सिसकते हैं
स्वार्थी बाहें हैं
इतने सबके बावज़ूद
धरा पर सब जीते हैं
खुश रहने के लिए
सच
सब
कुछ न कुछ
पीते हैं //
 
कभी ग़म का ज़हर
पीते हैं
कभी ख़ुशी का वज़ूद
पीते हैं
रीत गए हैं
अब आँखों के ख़्वाब
पीते हैं
कभी अश्कों की हाला
पीते हैं
सच कहूँ तो दोस्तों
आदि से अंत तक
जीवन की तंग गलियों से
गुज़रते गुज़रते
सब
कुछ न कुछ
पीते हैं //
 
 
सुशील सरना
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