कवि हृदय की उद्गार : सुनो कौशिकी !

युवा कवि दिलीप कुमार अर्श का काव्य संग्रह ‘सुनो कौशिकी !’ मेरी व्यक्तिगत व्यस्तता के चलते पाठकों के बीच पहुंचने से रह गया। कवि-इच्छा थी कि इसकी समीक्षा मेरे द्वारा की जाए। शायद इस जिद् ने ही मुझे आज विवश कर दिया कि सब कुछ छोड़ कर इस काम को पूरा कर पाठकों के हवाले कर दिया जाए।
सबसे पहली बात कि कविता जो दुनिया भर की सभी सभ्य, परिनिष्ठित भाषाओं में प्राचीन साहित्यिक विधा के रूप में पहचानी जाती है हजारों वर्षों की यात्रा कर यहां तक पहुंची है। इसकी यात्रा निर्विघ्न कभी-कहीं नहीं थी। किसी नदी की तरह ही उभड़-खाबड़, ऊंचे-नीचे, पथरीले, मैदानी इलाकों से होती हुई मानस से प्रवाहित होती हृदयंगम हुई। मेरी दृष्टि में अर्श कौशिकी के बहाने कविता के संघर्ष को जीवंत कर देते हैं –
“लेकिन सच कहूँ
ऐ कौशिकी !
तेरा पानी कभी भी सूखता नहीं
कहीं तो खूब भीतर कोई
अक्षय स्त्रोत-उद्गम तेरा
हरा रहता है रोज चैतन्य जैसे
महसूस होता
अंदर सदा प्रवहमान जल-कण..” (सुनो कौशिकी !)
कविता में रुचि रखने वाले जानते हैं कि यूरोप में सोलहवीं शताब्दी के आसपास इसके भविष्य को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई गई और भारत जैसे देशों में जब बीसवीं शताब्दी में पूंजीवादी व्यवस्था का प्रभाव बढ़ने लगा तो काफी लोगों ने कविता के अंत की घोषणा करना आरंभ कर दिया। कविता आज भी जिंदा है और तब तक जिंदा रहेगी जब तक वेदना को उसकी संवेदना की चाह है। कविता के विरुद्ध षड्यंत्र रचने का काम उस हर एक का है जो मानव मन की कोमल भावनाओं, संवेदनाओं को छिन्न-भिन्न कर देना चाहता है। जब तक मानवीय संवेदनाओं को नष्ट नहीं कर दिया जाता तब तक उसके हृदय को संकुचित नहीं किया जा सकता है। इस घिनौने काम में सबसे बड़ी भूमिका पूंजीवाद की है।
पूंजीवाद उस हर एक वस्तु को सुरक्षित रखने में अपनी शक्ति व्यय करता है जिससे उसके प्रभुत्व को विस्तार मिले। इसीलिए कभी धर्म तो कभी फासीवाद को रक्षित करने का ढोंग रचता है और जिस समय वह उसके लिए गैरजरूरी हो जाते हैं, उन्हें एक झटके में अपने आप से अलग कर देता है, जैसा कि सामंतवाद के साथ उसने किया।जातीयता, धार्मिक उन्माद, राष्ट्रवाद, आतंकवाद जैसे हिंसक घटनाओं के बल पर फलता-फूलता पूंजीवाद आज मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बन गया है।अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस जैसे पूंजीवादी देशों की फैक्टरियों में ढाले जा रहे हथियार किसे बेचे जाएंगे और इन से किसकी मौत होनी है; निश्चित रूप से आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर और आश्रित देशों को जो विश्व बैंक के सामने बार-बार घुटने टेकने को विवश होते हैं हत्या तो मनुष्य की ही होनी है। आज पूंजीवाद के लिए मनुष्य भी गैरजरूरी हो गया। संपत्ति पर स्वामित्व की लालसा पूंजीवाद को हिंसक बना रही है। साहित्य पूंजीवाद के लिए प्रतिपक्ष का काम करता है क्योंकि वह मनुष्य को हिंसक पशु बनने से रोकता है। साहित्य में यह काम कविता बखूबी निभाती है। इसीलिए कविता पूंजीवादी व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती रही है। इस षड्यंत्र को स्पष्ट करते हुए कवि कहता है –
“बोलना मत बाद में
कि बताई नहीं मैंने भी वह बात तुम्हें
जो पहले कभी किसी ने कही नहीं
कि अस्थि-कंकाल में रहती नहीं मुस्कुराहट कभी”
(बोलना मत बाद में)
‘सुनो कौशिकी !’ में संकलित कविताओं के माध्यम से कवि ने अपने समय को भरपूर जीने का प्रयास किया है। अतीत से विछिन्न नहीं हुआ जा सकता और न ही अतीतजीवी बनकर वर्तमान को अपनी भूमिका से प्रभावित किया जा सकता है। इसकी घोषणा तो उसने ‘सुनो कौशिकी !’ को संबोधित करते हुए पहले ही कर दिया है –
ऐ कौशिकी !
विछिन्न होना है नहीं आसान
उस सुदूर अतीत से
मुमकिन नहीं होना कभी भी भिन्न
उसके सतत उद्गीथ से…”
(सुनो कौशिकी)
कवि के भीतर अतीत जीवित रहता है क्योंकि जीवन की सतत प्रवाहमान धारा का उद्गम जो है। धारा अपने प्रवाह के साथ बहुत कुछ ऐसा लिए चलती है जो उसकी यात्रा की गाथा के साथ प्रमाणित होता जाता हैं। यह प्रवाह ही उसे अतीत से वर्तमान तक ले आता है बिलकुल नई भूमिका के निर्वहन हेतु। इसीलिए कवि सामयिक संदर्भों से अपने को अलग नहीं करता है। इसीलिए जोर देते हुए कहता है –
“मुझे मत बनाओ
अतीत का अग्रज
न ही भ्रूण भविष्य का
मुझे रहने दो बस
सहोदर वर्तमान का
क्योंकि मुझे देखना है
अभी और केवल अभी का जीवन…”
(यह बताना है अभी)
उपरोक्त पंक्तियों को ध्यान से देखें, परखें तो युवा कवि की मौलिकता और दिशा के संकेत यहां स्पष्ट मिलने लगते हैं। वह वर्तमान के खतरे को भांप चुका है इसीलिए कर्मकाण्डी बनकर न तो आध्यात्मिक आदर्शवादिता के लोभ में पड़ता है और न ही आँखों के सामने की विभीषिका से नजरें बचाकर वह आशावादी की तरह ढोंग ही करता है बल्कि उदारीकरण के बहाने पूंजीवादी षडयंत्र को चिह्नित करने का सफल प्रयास करता है –
बोलना मत बाद में
कि बताया नहीं मैंने
कि बदल गई हैं बच्चों की स्कूली प्रार्थनाएं
उनके शब्द, उनकी पुकार, कामनाएं या अभीष्ट
क्योंकि अब बदल गए हैं उनके ईष्ट….”
(बोलना मत बाद में)
मुझे याद आता है सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ का ‘संसद से सड़क तक ‘ काव्य संग्रह जिसमें ऐसी ही कई धारदार कविताएं हैं जो बिना लाग-लपेट के अपने समय से सीधा संवाद करते हुए पूंजीवादी षडयंत्रों की कलई खोलकर रख देती हैं। कहते हैं युग परिवर्तन के साथ ही संघर्ष और षडयंत्रों में रूप के साथ ही चारित्रिक-परिवर्तन देखने को मिलता है। “कठिन समय” में ही आम आदमी के संघर्षों को नई ऊर्जा से ओतप्रोत करने के लिए युगानुकूल कवियों का आगमन होता है। निश्चित रूप से हम एक कठिन समय से गुजर रहे हैं इसीलिए आज संघर्षों का कवि और कविता दोनों ही आपेक्षित हैं। ऐसे समय में जब पूंजीवादी हितों को साकार करने के लिए फासीवादी तरीका अपनाया जा रहा है तब कविता को भी अपने शब्दों के औजार को दुरुस्त और हथियार को पैना करना होगा। उसे छायावादी भाषा में नहीं बल्कि यथार्थ को स्पष्ट करने वाली भाषा का चुनाव करना होगा;क्योंकि –
“कठिन समय में और.कठिन होता
कविता का होना
काफी नहीं है कविता के लिए सिर्फ रोना
या सिर्फ विरोध, आक्रोश या गाली….”
(कोई कवि नहीं)
अर्श साहब कविता में समावेशित नए प्रतीक की तलाश कर उसको व्याख्यायित करते हैं
“लेकिन कविता है मौलिक अधिकार
आत्मा के राज्य में हरेक जिंदा मनुष्य का
और आलोचना है कर्तव्य वहां
हर त्रिनेत्रदर्शी मनुष्य का….।”
(कोई कवि नहीं)
यह त्रिनेत्रदर्शी कौन है ? जब तक युग का अगुआ नहीं आ जाता इस भूमिका का निर्वाह कवि को करना होगा उसकी भूमिका से षडयंत्रकारी को आपत्ति होना स्वाभाविक है। किंतु षडयंत्र के विरुद्ध कविता की सामर्थ्य, निहितार्थों को लेकर जब अपने ही सशंकित होकर आपत्ति करने लगते हैं तो कवि उन्हें स्वतंत्रता दे देता है । वह वर्तमान के खतरों से भली प्रकार परिचित हैं इसलिए चाहता कि जनता भी इस बाजारवाद के हथकंडे का शिकार होने से तभी बच पाएगी जब वह आंख मूंदकर नहीं बल्कि आंखें खोलकर आपत्ति जताते हुए जांचने-परखने का काम खुद करे। वह इन आपत्तियों को कुछ यूं दर्ज करता है –
आपत्ति है
कुछ मित्रों को
मुझपे नहीं, मेरे शब्दों पर
उनके मिजाज पर,
उनके निहितार्थ पर
शब्दों की सामयिकता
सामर्थ्य पर…..।”
(आपत्ति है)
….आप अपनी स्मृतियों को टटोलेंगे तो आप को “कठिन समय” में क्यों कठिन होता है कविता लिखना और क्यों होने लगती है सभी को आपत्ति; इस तरह के अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे। कुछ नाम देता हूँ, स्मृतियों को ताजा करने के काम आएंगे। याद होगा जब दिल्ली की सत्ता पर दक्षिणपंथियों की राजनीतिक विजय हुई(लोकतंत्र में चुनाव होता है युद्ध नहीं) और सत्ता संभालते ही भारत में देशद्रोह और नक्सलियों का गढ़ शिक्षण संस्थान हो गए। अचानक जेएनयू जैसे अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान आतंकवादियों का गढ़ बताए जाने लगे, बुद्धिजीवियों के खिलाफ मुहिम चलाई गई । गोविंद पानसरे, एम एम कलबुर्गी, नरेन्द्र दाभोलकर और सितंबर 2017 आते-आते साहसी बौद्धिक महिला पत्रकार गौरी लंकेश की हत्याएं हुई। देश जानता है कि यह सब हिन्दुत्व की रक्षा और राष्ट्रवाद के विकास वाले ऐजेंडे को पूरा करने के लिए किया जा रहा था। देश के तमाम पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने बताया कि यह देश के भीतर अभिव्यक्ति की आजादी को समाप्त करने का राजनीतिक प्रयास है। लोगों ने अपने अवार्ड वापिस करने शुरू कर दिया ताकि मौन रूप से यह संदेश सत्ता तक पहुंच जाए लेकिन दुनिया ने “पहली बार” देखा कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र की सर्वोच्च अदालत के चार जज बाहर आकर कहने लगे कि लोकतंत्र खतरे में है। “कठिन समय” यह है कि सत्य अपराधी की तरह कांप रहा हो और जनता, असली अपराधी का अट्टहास सुन रही हो। कठिन समय में कवि-मन की व्यग्रता को अर्श साहब ने बड़ी ही शिद्दत के साथ पेश किया है जिसे आप सपाटबयानी समझने की भूल मत करिएगा –
“इसे सपाटबयानी समझो
या कि कविता
कोई फर्क नहीं
क्योंकि सच्चाई यही है
और इसे कहने में
सिर्फ कविता ही समर्थ है ।”
(पहली बार)
‘सुनो कौशिकी’ संग्रह दिलीप कुमार अर्श की चुनिंदा कविताओं का संकलन है। पिछले डेढ़ दशक से हिन्दी साहित्य में अपने साहित्यिक लेखन के जरिए सक्रिय भूमिका निभाने वाले युवा कवि अर्श का यह पहला काव्य संग्रह होने के बावजूद भाषा, शिल्प और अभिव्यक्ति की दृष्टि से सफल है। जन समस्याओं से र-ब-रू होना और उसका संवेदनात्मक आत्मसातीकरण एक कठिन प्रक्रिया है जिसका काव्यात्मक निर्वहन उनके यहाँ सहजता के साथ किया गया है। ऐसे मामलों में सबसे बड़ा खतरा यह होता है कि विचार हावी हो जाते हैं और कविता से काव्यात्मकता विलुप्त; अर्श ने उसे सुरक्षित रखा है। मेरे कथन की परख आप इन पंक्तियों से कर सकते हैं –
“पसरा है बाजार तुम्हारे घर के कोने-कोने में,
लाभ,लोभ-लालच हैं पकते भीतर कहीं भगोने में,
नैतिकता-आदर्श गायब है अगर हमारे आचरणों से,
शब्द आर्द्र फिर कैसे होंगे बोलो सूखे व्याकरणों से..”
(आत्मगीत :एक संवाद)
इस संग्रह के विषय में दो बातें जरूर कहना चाहूंगा कि संकलित 32 कविताओं में क्षमा करना, सड़क के बाईं ओर, बांटो मत मुझे, पहली बार, मैं और आप जैसी कई कविताएं हैं जो अपनी संवेदनशीलता और व्यंग्यपरकता के कारण काव्य प्रेमियों द्वारा सराही जाएंगी। दूसरी बात यह कि इसमें संकलित 28 ग़ज़लें(कुछ नज़्में) संग्रह को और भी मूल्यवान बना देती हैं। ग़ज़लों को कहने का अंदाज अर्श साहब का अपना है। इसे आम जनता की भाषा में कहें तो जरा हट के हैं। उनके दो अलग-अलग ग़ज़लों के शे’र हैं गौर फरमाएं-
“चुन सभी ने दी अगर सत्ता तुम्हारे हाथ में,
सात फेरे मत समझना या कि मेहरारू उसे।।”
या
“थके प्यासे ख्वाब कोई मर नहीं जाएं कहीं,
पानी पिला दे अर्श तू अपने सुराही का ।।”

डॉ. कविता नन्दन

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