रिश्ते अब तो

रिसने लगे हैं

कभी – कभी तो

टीसने भी लगे हैं

आजकल इतने

बनावटी और खोखले

हो गए हैं रिश्ते कि

ऊपर से कछुए जैसी

मोटी खाल का मुखौटा लगा

परत- दर- परत सुनहरे

मेकअप का मुलम्मा चढ़ा

चट करने लगे हैं

अपनों को ही

अन्दर ही अन्दर

दीमक की तरह

परिणाम ……………..

चटकने लगे हैं

आईने विश्वास के

टूटने लगी है

मजबूत डोर

परस्पर प्यार की

रह गई हैं मात्र

औपचारिकताएं

दिखावे भर को सीमित

बर्थडे , मैरिज एनिवर्सरी या फिर

होली – दीवाली पर

‘ हाय ! हैलो ! कैसी हो ?

यहां पर सब ठीक है ।’

जैसे वाक्यांशों में सिमटी

एक फोन कॉल तक

या फिर एक एसएमएस तक

न रहा राखी का नेग

न तीज का सिनारा

न मेंहदी – मोली और

न ही ओढ़नी – कांचली

ज्यादा हुआ तो

कैश डिपाजिट करवा दिया

आनलाइन यूअर अकाउंट में

और हो गई

कर्तव्य की इतिश्री

तभी तो ना रही अब

रिश्तों में वो गरमाहट

ना ही एक दूसरे की

चिन्ता में रात – रात भर जागना

और वो सांसों का

ऊपर – नीचे उठना

रह गए हैं बस

ये मशीनी उपकरण

एक दूसरे का हाल जानने को

अपना असली चेहरा छुपा

अच्छा बनने का ढोंग रचने को ।

सरिता सुराणा 

 

 

 

 

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