मन हुआ मगन प्रकृति संग

मन हुआ मगन प्रकृति संग

मन प्रसन्न
हुआ यह मगन
विहग नभ
करते विचरण
शाम सुहानी
विलीन दिवाकर
प्रकृति शोभा
नभ तल चाँदनी
तरिणी जल
जन-जीवनदानी
चाँद शीतल
रजनी मतवाली
तारे चमके
जगमग गगन
क्षीर्ण नयन
छाई घोर कालिमा
जड़ मस्तिष्क
उमड़ता औत्सुक्य
नवप्रभात
प्रकट प्रभाकर
उषा किरण
आई सुभग बेला
आदि न अंत
सृष्टि नवसृजन
नमन-ही-नमन

जापानी साहित्य विद्या
चोका ( 5+7+5+7+5+7+5+7+7)

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नीरू मोहन "वागीश्वरी"

MA. Political Science MA. Hindi B.ed Hindi/ Social Science MPhill. Hindi Sahitya

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