दिव्य लोक से वापसी

 ये बालू के टीले, गोल-गोल सफ़ेद, काले, भूरे पत्थर, ये श्मशान यहाँ की निधियां हैं और यह पुराना गर्डरों का ढेर, बनने को सभी कुछ बन सकता है-पुल,मकान आदि सब कुछ परन्तु बनता ही नहीं या बन ही नहीं पाता या बनने ही नहीं दिया जाता। सूरज की तेज धूप में सहस्त्रों मणियों या दर्पणों की तरह बालू की निधियों की तपिश में चमकता हुआ अबरक आँखें चुँधिया देता है । असह्य गर्मी में नदी का कल निनाद भी काक क्रेंकार से बढ़कर कुछ नहीं लगता । इस दोपहर में नदी के अलावा किसी जीव की आवाज़ सुनना भी दुर्लभ है… यह दिव्यलोक!

वैसे बस आने को छोड़कर जाने का समय भी जा चुका है परन्तु मुझे अभी भी उसके आने की प्रतीक्षा है, आशा है । आशा है तभी तो प्रतीक्षा भी है। और शायद वह आएगी ही, अब धूप एक पहाड़ी से उतर कर दूसरी पर चढ़ना चाह रही है-शायद दिन ढल रहा है, हाँ; वैसे मैं ठीक-ठीक भी नहीं बता सकता कि दिन ढल रहा है, उसके उगने ढलने में मुझे विश्वास है भी नहीं । मुझे आज अवश्य जाना है, बस को भी इसलिए अवश्य आना चाहिए, दिव्य-लोक से लौटता हुआ मुसाफ़िर!

यहाँ वेटिंग रूम नहीं वेटिंग ग्राउंड है। मैं एक पेड़ की छाँव में खड़ा हूँ । आम का पेड़ है यह । पैर खड़ा होने से जवाब दे रहे हैं परन्तु मुझे बस की प्रतीक्षा है इसलिए खड़ा रहना अधिक अच्छा है यही मेरी मति है । भगीरथ ने भी तो गंगा को स्वर्ग से लाने के लिए  एक पाँव पर खड़े रहकर तपस्या की थी । अस्तु, मैं अब तक खड़ा हूँ । मुझे बस की प्रतीक्षा है, यह मेरी समझदारी भी हो सकती है नासमझी भी आवश्यकता भी, लौटने के लिए बस का प्रतीक्षु ।

पेड़ के पास ही छाया में दिव्य लोक की एक कामधेनु पड़ी है । उसके आलौकिक शरीर में मांस खोजना मुश्किल है, हाँ; हड्डियाँ एक-एक आसानी से गिनी जा सकती हैं । वहाँ पर वह बैठे-बैठे ही कभी के गिरे हुए तृण टटोल रही है । यह दुधारू पशु । इसे भी प्रतीक्षा है, यह मौत की प्रतीक्षा में है और मैं बस की । सामने एक मुर्गी अपने चार-पाँच बच्चों को अपने पंखों में समेट कर पत्थर की छाया में बैठ गयी है । कभी-कभी कोई-कोई बच्चा कुलबुला उठता है तो वह उठ जाती है और सभी बच्चे उसके पंखों में छिपे दिख जाते हैं । तभी कुड़… कुड़… कुड़…करती हुई वह बैठ जाती है ।

जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी उसके आने का संकेत मुझे दूर सड़क पर उड़ती धूल से मिल गया है । मेरी प्रतीक्षा शत प्रतिशत सफल रही, बस उसी अधकचरी सड़क पर आ रही है । उसकी छत पर ढेरों सामान है और उस पर आदमी बैठे हुए हैं । भीतर भी आदमी बैठे लग रहे हैं क्योंकि प्रत्येक खिड़की से दो-दो मुँह बाहर झांक रहे हैं । इतने में घरघराती हुई बस अपने स्थान पर आ लगी। टिड्डी दल की भान्ति चारों ओर से बस लोगों द्वारा घेर ले गयी, उतरने वालों द्वारा नहीं, जाने वालों द्वारा, अभी तक एक आदमी नज़र नहीं आता था और ये गोरिल्ला योद्धाओं की भान्ति अप्रत्याशित रूप से कहाँ से आ निकले । ये देवदूत! या लूटेरे!! चलो जो भी हैं अब मुझे यहाँ से चले ही जाना है, सोचता हूँ शायद अब यहाँ आऊँ या कभी न आऊँ इसलिए जी भर आँखें फाड़-फाड़कर चारों ओर देखने लगता हूँ ।

इतने में सब मुसाफ़िर उतर चुके, जानेवाले सीटों पर बैठ गये हैं, मैं भी एक सीट पर बैठ गया हूँ ।  बैठता भी क्यों नहीं इतनी देर से प्रतीक्षा जो कर रहा था । इस सीट को पाने में मुझे कितनी कठिनाई हुई यह मुझसे न कहा जाएगा, क्योंकि इतने में ही सांस फूल जाती है और उच्च रक्तचाप का आभास होता है । इस सीट को पाकर मुझे कितना सुख अनुभव हुआ, शायद गंगा को पाकर भगीरथ को जितना मिला था । भगीरथ को तो एक टांग मोड़कर एक टांग पर तपस्या करनी पड़ी थी और मुझे दोनों टांगों पर खड़े होकर । अब मेरी तपस्या सफल हुई । ड्राईवर उतर पड़ा और बोला एवमस्तु ।

अब मैं खिड़की से बाहर झांक रहा हूँ । सड़क के दोनों किनारों पर इसी के द्वारा लाया गया सामान है और लोग । लोग हैं, उनके बीबी बच्चे हैं, कोई अकेला है, कोई अकेली है, कोई कुली किराए के लिए झुँझला रहा है। अब मुझे यहाँ से ज़रूर जाना है शत प्रतिशत क्योंकि मुझे सीट मिल गयी है । इसीलिए मैं जी भर देख लूँ ।

मेरी निगाह अब एक नये यात्री पर पड़ी है वह उतर चुका है । साथ उसकी पत्नी है, समान असबाब भी है । सारा समान वह सिर और कंधे पर लटकाये जा रहा है   और  पत्नी महाशया खाली हाथ निकल ली हैं । चंद लोगों की आपसी फुसफुसाहटों और उनकी युग्म  को बेधती नज़रों ने कह दिया कि ये इसी लोक के पत्नीव्रत हैं । नाम मैं इनसे पूछकर जान चुका हूँ  परन्तु सभी को बतलाकर इनका महत्व बढ़ाना या घटाना नहीं चाहता । हाँ ! इतनाभर बतला दूँ कि इनके लिये तुलसीदास जी कह चुके हैं –“नारि मुई घर सम्पति नासी मूड़ मुड़ाय भये सन्यासी …” अतः मैं अपनी लेखनी को थकाना नहीं चाहता ।

और सचमुच एक बार ये ऐसा कर भी चुके हैं । तो क्या यह इनकी दूसरी पत्नी हैं ? नहीं जी !  यह वही पत्नी हैं , परन्तु एक बार वे किसी दूसरे दिव्य पुरुष के साथ हो लीं थीं शायद बहुपत्नी प्रथा की  प्रतिक्रिया में बहुपति प्रथा प्रयोग के लिये । परन्तु, ये पति अपने पत्नीव्रत धर्म का निर्वाह करते हुये इन्हें उस पति से किसी तरह वापस ले ही आये हैं । आप चाहें तो इनकी अग्नि परीक्षा ले सकते हैं मगर ध्यान रहे या तो इन्हें आग के चारों ओर या आग को इनके चारों ओर घुमायें , इन्हें आग में डालकर खाक बनाने का प्रयत्न नहीं करें । खरे उतरेंगे । मुझे तो ऐसा करना नहीं है और सचमुच मैं  लौट रहा हूँ … पत्नीव्रत की परीक्षा लेने का वक़्त नहीं है … ये पत्नीव्रत !

इन मुसाफ़िरों और इनके समान असबाब के रेले को छोड़कर मेरी नज़र आगे चली गई  है, यह एक अच्छे अधकचरे तुनक मिज़ाज महाशय हैं ।  दिन की घहराई दुपहरिया में नंगे पाँव कहीं लम्बे सफ़र से आये हैं  और अब जब यहाँ हल्की छांव हो चली है, धूप का चश्मा लगाये निकाई गुड़ाई कर रहे हैं, उनके चलते मुँह से बड़बड़ाने का अंदाज़ाभर लग पाया मगर शोर में कुछ सुन न पाया । आह ! कितना विचित्र स्थान है मेरी तो यहाँ रहने की चाह उमड़ चली है परन्तु, मैं तो बस में बैठ चुका । जैसे यूनानियों ने भारतीयों से बहुत कुछ सीखा और भारतीयों ने यूनानियों से ।  ठीक वैसे ही मैं भी इनसे बहुत कुछ सीख कर एक इतिहास गढ़ लेता  और इतिहासकार बन जाता परन्तु ऐसा कुछ हो न पाया ।

लोगों की निगाहें मुझे घूर रही हैं । मैं किसी की भी निगाह के मायने समझ नहीं पाया, परन्तु  हाँ मुझे वे घूरे ही जा रहे हैं –कोई कैसे तो कोई कैसे । मुझे  लगा ये दुनिया है और ये दुनिया की निगाहें । बीस मिनट बाद बस यहाँ से चल पड़ी । अब मैं इस दिव्य लोक को छोड़ कर जा रहा हूँ । परन्तु, यह मुझसे छोड़ते बनता है या न बनता है जैसे इसके पास पड़ी ये गर्डरें जिनसे पुल बनना था मगर न बन सका । धीरे-धीरे यह लोक आँखों से ओझल होता जा रहा है  परन्तु आँखों ने एक बूँद आँसू गिरने में भी कृपणता कर ही दी । मैं उदास हूँ या हर्षित… इसका अंदाज़ा आप खुद लगा सकते हैं  । ये मेरा प्रेम है या प्रेमोत्सर्ग ! नहीं पता ।

जब यह पूरा लोक घाटियों और पहाड़ियों के पीछे छिप गया तो सूरज भी छिप ही गया । अब मुझे विश्वास भी हो गया कि  दिन ढलता भी है  । मैंने अब बस के भीतर नज़रें घुमा लीं …मेरे सामनेवाली सीट पर से एक नव युवती  संशयग्रस्त नज़रों से मुझे घूर रही थी । शायद वह मेरे चेहरे की ब्रह्मलिपि पढ़ रही थी । मैंने सारी बस में नज़रें घुमाईं  फिर नज़र उस पर अटक कर झुक गयीं  और उस लोक में खो गया जो पहाड़ियों के पीछे छिप गया था । इतने में अचानक ब्रेक लगा, सबका सन्तुलन कुछ बिगड़ा , सवारियां एक तरफ़ लुढ़कीं और अनचाहे टकरा ही गयीं । मेरा भी ध्यान टूटा और फ़िर कल्पनालोक में खो गया एक बार फ़िर ।….अब मैं बाहर झांक रहा था, कोई आ रहे थे, कोई जा रहे थे । मुझे लगा दुनिया संग का मेला है; मैं भी इसी दुनिया में हूँ , मेरा भी संग है, इस समय इतने यात्री और ये बस । थोड़ी देर में कोई और । शायद यही संग है यही मेला ।

बस मन्द गति से झटकों के साथ आगे बढ़ रही है । दुर्गम चट्टानों का मार्ग जो है । बार-बार उस पीछे छूटे लोक की याद में ही खोया हूँ । कोई याद उजली हो जाती है तो कोई धूप छांव सी धुंधला जाती है और वह नवयौवना मुझ में ही खोयी है । विगत की यादों में कुछ इस कदर मैं खोया हूँ कि मुझे खिड़की से बाहर कुछ दीखता ही नहीं । खोना भी तो एक सुख है, मैं यादों में खोया हूँ तो यह मुझमें । लगता है मेरा खोना विस्तृत है और इसका सीमित । यह एक व्यक्ति में खोकर ब्रह्माण्ड में खोयी है जबकि मैं एक दिव्यलोक में खोकर खो रह हूँ । परन्तु, मैं उसके बारे में ठीक से कह भी तो नहीं सकता; किसीका मुखौटा और हृदय तरंगों की गति पढ़ना आसान नहीं । शायद वह अकेली है और खुद को अकेलेपन से ग्रस्त समझ रही है । मगर, मुझे इससे क्या? मैं तो लौट रहा हूँ … लौट ही जाऊँगा, फ़िर भी वह एकटक क्योंकर घूरे जा रही है । मुझमें किसको खोज रही है ?

बस झटके से रुक गयी, मुझे उतरना था उतर गया । रात भी धरातल पर उतर चुकी थी । विगत की यादें घनीभूत हो चली थीं । दिव्यलोक से मैं पूर्णतया वापस आ चुका था । फ़िर भी हम उसी तरह खोये थे । मैंने सभी की भांति सीट छोड़ दी-जैसे मेरा इसे कोई सम्बन्ध था ही नहीं । मैं उठा ही था कि उस युवती ने पुकारा –“मुझे पहिचाना नहीं शायद आपने! ”

उन आँखों में प्रश्नसूचकता थी और यौवन का आलस्य  । मैं अब समझा कि वह पहिचान की ब्रह्मलिपि पढ़ रही थी । सशंकित मैंने अचकचाकर उत्तर दिया –“नहीं”  और प्रतीक्षा करने लगा कि वह उत्तर दे इस नहीं का ।

“मैं नीरजा हूँ .. ”

“नीरजा !!…” शब्द ने एकबार फ़िर झकझोरते हुए अतीत मेरे सामने उकेर दिया । चित्रपट की मानिंद जीवन आँखों के समक्ष उतराने लगा था । तनिक मैं उस नवीनतम व्यतीत को भूलकर बहुत पीछे जीवन के गलियारों का बालक बन गया था … हँसता, खेलता  शैशव का सुखानुभावी नादान बालक और एक कल्लोलमय सुख की तरलता… जिसमें मैं पुनः आकण्ठ डूबता चला ही गया …आवाक् खड़ा ही रह गया । सामने बचपन नर्तन कर रहा था ।…“नीरजा”….शब्द इतना महत्वपूर्ण ?

“नीरजा” मेरी बाल सखी थी ।

-प्रो0 बी0 डी0 इन्दु

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