मसीहा

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मसीहा

By |2017-07-05T08:55:33+00:00July 3rd, 2017|Categories: कविता|Tags: |0 Comments

कोई नहीं मसीहा तुम्हारा , न कोई है रक्षक ,

सारा जहाँ बना है दुश्मन, हर कोई है भक्षक |

गली -गली और नुक्कड़ -नुक्कड़ होतीं तुम अपमानित ,

कहते देवी पर लगती हो सदियों से तुम शापित |

मेरा कहा जो मानो तो अब भारत की महिलाओं

अपनी रक्षा की खातिर तुम खुद ही शस्त्र उठाओ  |

शस्त्र तुम्हारे नहीं दुनाली, तीर न ही शमशीर,

सीख कराटे कुंफू कुश्ती बनो तुम भी अब वीर |

अबला नहीं बनो अब सबला दिखला दो दुनिया को ,

ज़ुल्मत नहीं सहेंगे यह मंज़ूर नहीं अब हमको |

दिखला देंगे सबको अब हम एक नयी तस्वीर ,

खुद लिखेंगे हिम्मत करके , हम अपनी तक़दीर |

-मंजू सिंह

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