आत्मविश्वास

आत्मविश्वास से हमेशा लबालब रहने वाली कनिका सरकारी विधालय में अध्यापिका के पद पर आसीन थी। बच्चे उसका हमेशा सम्मान करते थे क्योंकि वह किसी भी समस्या का निराकरण आसानी से कर देती थी। प्रधानाचार्य जी भी उसकी आदतों से वाक़िफ़ थे और हमेशा महत्वपूर्ण कार्य उसी को देते थे। इसीलिये सारे अध्यापक हमेशा उससे ईर्ष्या करते आये थे। परंतु वह किसी की परवाह किये बिना ही अपने कार्य को अंजाम तक पहुँचा देती थी।
एक बार विधालय का निरीक्षण करने जिले से बड़े अधिकारी आये। उन्होंने विधालय का निरीक्षण कार्य शुरू किया। अचानक ही उनके क़दम एक कक्षा के बाहर ठिठक गये! उनको अपने कानों पर यक़ीन नहीं हो पा रहा था! क्या ये शब्द एक अध्यापिका के हो सकते हैं क्योंकि आज के बदलते परिवेश में नामुमकिन को मुमकिन करने का काम कुछ वरले ही कर पाते हैं।
ज़रा आप भी वह शब्द सुनिये जो वह बच्चों को समझा रही थी “मैं आज कुछ भी हो सकती हूँ लेकिन फिर भी मैं कल बहुत कुछ होने के सपने ज़रूर देखूँ। उन सपनों पर थोड़ा सा काम करूँ और यह यक़ीन करूँ कि मैं परसों बहुत कुछ कर सकती हूँ। इसलिये निरंतर आगे बढ़ने के सपने ज़रूर देखो।”
निरीक्षण अधिकारी जी उसकी बातों से बहुत प्रभावित हुए और उसका नाम शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति पुरस्कार के लिये भेज दिया और साथ में प्रधानाचार्य जी को भी बधाई दी कि जिस विधालय में ऐसे उत्साहवर्धक शिक्षक होंगे उसका भविष्य निश्चित ही अपने सपनों से कहीं आगे होगा। मुस्कुराते हुए वहाँ से निकल गये और अपने आगे आने वाले दिनों के लिये सपने संजोने लगे।

नूतन गर्ग

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