तुझ बिन भी…मैं कस्तूरी हूँ

तुझ बिन भी…मैं कस्तूरी हूँ

By |2017-07-08T20:05:45+00:00July 6th, 2017|Categories: आलोचना|0 Comments

तूने मुझे केंद्र मानकर
मुझसे इश्क़ किया
इश्क़ की नयी नयी परिभाषाएँ रची
प्रेम में तू उस कम्पास की तरह था
जिसका एक छोर मेरे केंद्र पर था
तो दूसरा परिधि को गढ़ने में
तेरे संग रहते मैंने वहीं उसी केंद्र पर रहकर
तेरा मुझ तक लौटने का इंतज़ार किया
और तूने…
तुने तो इश्क़ की परिधि को
तुलिका संग पूरा करने का निर्णय लिया
और मुझ पर अपना एक छोर गढ़ाए
साँझ सवेरे मेरे इंतज़ार के ज़ख़्मों को गहरा करते गये
मेरे सामने ही तूने सात घेरे वाले
वचनो को निभाया…तुलिका संग
मैं तो केंद्र थी मात्र
जिस पर तेरा सिर्फ़ टिकाव था
तू लौटा जब भी मुझ तक
तेरे मेरे मध्य पूर्ण मिलाप भी
ध्वांत(अंधकार) में बदलता गया
तूने बाँध रखा था ख़ुदको
जात पात के नौचते नियमो में
और मैं..
मैं तो बावली लहर सी
तेरे इश्क़ के समंदर में
अस्तित्व खो बैठी थी.. ख़ुदका
पास रहने पर भी एक दूरी थी
उसी कम्पास के दो छोर की तरह
जो जुड़ने पर भी दूर होते हैं
सुन
वो जो तेरे छोर से दिए ज़ख़्म हैं ना
उनसे जो लाल रंग बिखरा था
उसे ही तेरे इश्क का सिंधुर समझ
फीकी से अब सिंदूरी दुल्हन हूँ मैं
दुल्हन…उसी घरौंदे की
जिसकी बुनियाद तेरे वादों
और मेरे विश्वास पर टिकी है
बुनियादी यादों के ठहरे हुए लम्हे
नयी नयी गहराइयाँ ले रहें हैं…मुझमें
तेरी बातों की ख़ुशबू से
मैं आज भी…कस्तूरी हूँ।।।

परिधि = जीवन रूपी घेरा
तुलिका = पेंसिल (धरमपत्नि)
कम्पास के दो छोर = प्रेमी, प्रेमिका

#पूजा

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