यह मेरी पहली धार्मिक यात्रा थी।यह यात्रा थी देवो के देव महादेव शंकर भगवान की जो कि बिजली महादेव के रूप में जिला कुल्लू में विराजमान है।मेरी मित्र का मुझे फ़ोन आया कि सावन के पावन माह में बिजली महादेव के दर्शन करने का विशेष महत्व है।मैं अगले ही दिन बस में कुल्लू की तरफ रवाना हो गयी। पहाड़ पर यह मेरी पहली धार्मिक यात्रा होने के साथ शंकर के दर्शन की कल्पना ने मेरे चिंतन को थोड़ा स्वप्निल बना दिया।अगले दिन सोमवार को अपने कुछ मित्रों के साथ मै यात्रा पर निकल पड़ी।हमने निश्चय किया कि हम गंतव्य स्थान तक नंगे पैर पैदल जायंगे।हालाँकि वहां आधे रास्ते तक वाहन की सुविधा भी थी हमने कुल्लु(रामशिला)नामक स्थान से नंगे पैर हर-हर महादेव के जयकारे के साथ यात्रा शुरू कर दी।रास्ते में जो प्रकृति के ख़ूबसूरत नज़ारे थे उन्हें देख कर मैं रोमाँचित हो गयी।इस क्षेत्र के पहाड़ व घाटियां बाकि हिमालय से बहुत जुदा लग रही थी।टेढे-मेढ़े कच्चे रास्ते पर गाँव से गुज़रते हुए आनंद की अलग ही अनुभूति हो रही थी। रास्ते के दोनों ओर सेब के बगीचे थे,पेड़ सेबों से भरे हुए थे।उनके बीच में पारंपरिक वेश-भूषा में काम कर रहे वहां के स्थानीय लोग बहुत सुन्दर लग रहे थे।पहाड़ों पर पत्थर व लकड़ी से बने घर बहुत सुन्दर थे।जब गाँव के बीच का रास्ता ख़तम हुआ तो जंगल का रास्ता शुरू को गया।जंगल के संकरे रास्ते के दोनों ओर देवदार के पेड़ों की घनी हरियाली ओर पेड़ों के बीच में से सूरज की किरणों की छनती हुई लालिमा वातावरण को बहुत ही मनोरम बना रही थी।कुल्लु की इन वादियों में प्रकृति ने अपनी असीम सुंदरता बिखेरी है।मैं प्रकृति के इस मनमोहक नज़ारे को देखती ही रह गयी और इसे अपने अंतर्मन में आत्मसात करती रही।रास्ते में लोगों का आना-जाना लगा हुआ था।एक दूसरे से अनजान होते हुए भी अपने लग रहे थे।सब बम-बम भोले का जयकार करते हुए जा रहे थे।इस सुन्दर नज़ारे को निहारते हुए हम वहां पहुँचने वाले थे जहाँ बिजली महादेव का मंदिर है,मन अंदर से पुलकित था।थोड़ी ही दूर से मंदिर का प्रवेश द्वार दिखाई देने लगा वहां पर रुकने के लिए टेंट की सुविधा थी,छोटी-छोटी दुकाने थी जहाँ से लोग सामान खरीद रहे रहे।यह दृश्य मेले की तरह था ।बहुत बड़ा मखमली घास का मैदान,उसके ऊपर छोटे-छोटे खिले फूल इतने सुन्दर लग यह थे मानो किसी ने फूलों की चादर बिछा दी हो।सब लोग वहां बहुत आनंद ले रहे थे।लकड़ी से बना हुआ शिवजी का भव्य मंदिर बहुत सुन्दर लग रहा था।मंदिर के बाहर छोटी-छोटी प्राचीन देवी-देवताओं की मूर्तियाँ रखी हुई है और एक बहुत बड़ा लकड़ी का स्तम्भ है जो कि कुल्लु नगर से भी दिखता है।कहा जाता है कि आसमानी बिजली गिरने से शिवजी की पिंडी खंडित हो जाती है तो इसे मक्खन से जोडा जाता है ,तभी यहाँ का नाम बिजली महादेव पड़ा।भगवान् का यह रूप बहुत मनोरम है।दर्शन करने के बाद हम वहां भगवान् का प्रसाद ग्रहण करने चले गए।कुल्लु के स्थानीय लोगो द्वारा वहां का पारंपरिक भोजन(धाम)का आयोजन लंगर के रूप में किया जाता है।इसके बाद हम मंदिर की पिछली तरफ गए जहाँसे कुल्लु व भुंतर घाटी का नज़ारा देखने को मिला।वहां से व्यास व पार्वती नदी के संगम का दृश्य बहुत ही सुन्दर था,चारों तरफ धुंध फैली हुई थी।ऐसा लग रहा था मानो मैं कैलेंडर में छपी हुई खूबसूरत तस्वीर देख रही हूँ।इसके बाद वहां भजन कीर्तन मंडली के साथ मैंने भी भगवान् भोले के कुछ भजन गाये।स्थानीय व पारंपरिक लोक गीतों व वाद्यों के माध्यम से वहां के लोगों ने स्नेह की,ज्ञान की परंपरा व संस्कृति की मानवीय रिश्तों की मानों बारिश सी कर दी । इन्ही खूबसूरत स्मृतियों के साथ शाम को हम वापिस आगये।
आश्चर्य,कि थकान का नाम तक नहीं था।

विद्या शर्मा

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