आतंकवादी

आतंकवाद सुनी थी हमने
इतिहास के पन्नो में पढ़ी थी हमने
तारीख में हों कई गवाह इसके
पर,शायद ये आजादी की बात हो
‘सन 47’ देश बदलने का आगाज़ हो
शब्दकोश खंगाले हमने,शायद
बर्बरता की कोई बात हो
वक्त बदला ,युग बदले
बातें कैसे बदल गईं
आतंकी की भी देखो परिभाषा
कैसे बदल गई
वेश बदल बदल बैठा है यह
संभलें कैसे कैसे आतंकियों से
कोई पैसे वाला है
कोई देश बेच खाने वाला है
बाहर के आतंकी से डर कैसा
जब देश के अंदर ही
आतंकियों का बोल-बाला है
सब जानते हैं पर चुप बैठे हैं
एक और ना खून खराबा हो
चुपचाप दबा देते हैं सच्चाई को
सुरक्षा का मामला है
कहीं वोट बैंक की राजनीति है
कहीं व्यापार बढ़ानी है
तह में राज़ छुपी पैसों की,बस
पैसा ही तो मनमाना है,
चाल, चरित्र, व्यक्तित्व हुई खोखली क्योंकि
मान चुके हैं अबसब
बस पैसों का ही जमाना है.
उसको मारो,उसको लूटो
उसको जीतो,उससे हारो
कैसे जिये नागरिक यहां का
कैसे नियम ये नागरिकता का
कहाँ-कहाँ संभालेगा देश
कह लोगों से”नहीं जात-धर्म आतंकवाद का”
बना हुआ है ‘धर्मनिर्पेक्ष’
कानूनों से नही बदलने वाले ये सब
घर की बर्बादी देख ना जब तक ये सब रोएंगे
खून-खराबा को आत्मशांति मान
आतंकवाद का साया बन देश पर तबतक ये मंडराएंगे.
Aparna Jha

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Aparna Jha

परिचय: अपर्णा झा,मिथिलांचल की बेटी,फरीदाबाद निवासी है.इन्होंने विषय द्वै (फ़ारसी एवं museology क्रमशः दिल्ली के जेएनयू एवम राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान)परास्नातक किया है सम्प्रति ये लेखन कार्य से जुड़ी हुई हैं.अनेकों साझा संग्रह एवं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं,वेब,अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में इनकी लघुकथा,आलेख,एवं रचनाएं प्रकाशित हुई हैं.सांस्कृतिक स्थलों में भ्रमण और हिन्दुस्ततानी संगीत सुनने का शौक है.पूर्व में इन्हें तीन साल का संग्रहालय के क्षेत्र में कार्य करने का अनुभव है.MY POINT of VIEW इनका पेज है ,My first blog और maithil point of

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