कड़वाहट

उस आम के पेड़ पर ढेर सारे बंदर आज गुमसुम बैठे हुए थे। जेठ की तपती धूप…..गर्म लू के थपेड़े तन को झुलसा देने को उतारू थे। बंदरों को चुपचाप देख, पेड़ से रहा नहीं गया, तो वह बोल पड़ा – ” आजकल तुमलोग मुझसे बात नहीं करते ? क्या बात है ? “
” कुछ नहीं ।बस, यूँ ही…। ” – एक बंदर ने बड़ी बेरूखी से कहा और इधर-उधर देखने लगा।
” कोई तकलीफ है, तो मुझे बताओ। ” – पेड़ ने अपनी पत्तियों से उन्हें सहलाते हुए बड़ी आत्मीयता से पूछा।
बंदरों ने कहा – ” क्या बताएँ….! कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है। बहुत दु:खी हैं हम। जंगल-पेड़ों से न तो अब हमें आश्रय मिलता है, न ही फल-फूल।मजबूरन, हम गाँव-शहर में जाते हैं, तो बेरहमी से मारकर वहाँ से भी हमें भगा दिया जाता है।आखिर हम जाएँ, तो कहाँ जाएँ…..? हमारा तो जीना मुश्किल हो गया है। ”
” तुम हमारे पास ही रहो। हम रक्षा करेंगे तुम्हारी। ” – पेड़ ने द्रवित होते हुए बड़े-बुजुर्ग की अपनी भूमिका का निर्वाह किया।
” तुम क्या आश्रय दोगे, पेड़ भाई….? ” – बंदरों ने रोनी हँसी हँसते हुए कहा – ” ….तुम्हारे अस्तित्व पर तो खुद ही संकट है। “
” हूँ….। देखो न, हमें मिटाकर इन जालिमों ने कंक्रीट के जंगल उगा लिए…..। ” – सामने दूर-दूर तक फैली गगनचुंबी अट्टालिकाओं को देख ठंडी साँसें भरते हुए पेड़ ने कहा।
” ….पेड़ भाई, अब तो तुम्हारे फल भी मीठे नहीं रहे। कड़वे हो गये हैं।” – बंदरों ने उलाहना दिया।
” क्या करें भाई ? जब पूरी हवा-पानी-मिट्टी में ही वर्ण-जाति-धर्म-संप्रदाय-विचारधारा-सामाजिक व्यवस्था को लेकर घृणा, नफरत, ईर्ष्या, द्वेष का जहर घुल रहा हो, तो फिर हमारे फल इससे अछूते कैसे रहेंगे, भाई…..? ” – पेड़ ने निरीह भाव से कहा।
पेड़ पर फिर से सन्नाटा पसर गया था। बस, गर्म तेज हवा से पत्तों के थरथराने की आवाज आ रही थी।धूप और तीक्ष्ण हो गयी थी, जो धरती को झुलसाने लगी थी।

विजयानंद विजय

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