यादों के झरोखे – 1

।।1।।

चाहत के समंदर में, मेरी जां क्‍यूं मचलती है

बुढ़ापा रोज बढ़ता है, जवानी रोज ढलती है ।

कभी अपना इरादा तो, जरा बतला दे तू दिलब़र

कि तू प्रेम करती है, या कोई चाल चलती है ।।

।।2।।

तेरे चेहरे पे रौनक है, तो क्‍यूं इतना इतरती है

मेरी चाहत की सौगातें, कहाँ हर रोज मिलती है ।

हर दिन यूं जवानी पर, गुमां करती है क्‍यूं सुन ले

बुढ़ापा रोज चढ़ता है, जवानी रोज ढलती है ।।

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