दो शब्‍द…

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दो शब्‍द…

By |2017-07-17T13:06:11+00:00July 17th, 2017|Categories: सम्पादकीय|0 Comments

ईश्‍वर की समस्‍त रचनाओं में मनुष्‍य को सर्वश्रेष्‍ठ माना जाता है, क्‍योंकि मनुष्‍य ही एकमात्र वह जीव है जो आपसी व्‍यवहार करने के साथ ही साथ सोचने, समझने, पढ़ने व लिखने की क्षमता रखता है । चीन, अमेरिका, जर्मनी जैसे विकसित देश अपने दैनिक व्‍यवहार से लेकर कार्यालय कार्यों तक अपनी मातृभाषा को ही प्राथमिकता देते हैं, परन्‍तु हमारे देश में हमारी मातृभाषा की उपेक्षा की जा रही है । जिसे अंग्रेजी अथवा अन्‍य किसी (विदेशी) भाषा का ज्ञान हो, उसे लोग प्राथमिकता देने लगे हैं, फलस्‍वरूप हिन्‍दी लिखने पढ़ने वाले अपने आपको हीन दृष्टि से देखने लगे हैं, जिस भाषा पर सभी को गर्व करना चाहिए, उसी भाषा से लोग किनारा करने लगे हैं । आजकल कोई भी अपने बच्‍चे को हिन्‍दी माध्‍यम से पढ़वाना नहीं चाहता, जहाँ तक शिक्षा की बात है, हर भाषा का ज्ञान होना अच्‍छी बात है, परन्‍तु आगे बढ़कर अपनी भाषा को भूल जाना अथवा उपेक्षा करना, ये तो गलत बात है । यदि हम अपनी भाषा पर गर्व नहीं करेंगें तो फिर कौन करेगा ? विदेशी संस्‍कृति व भाषा को अपनाते-अपनाते हम हमारी संस्‍कृति व भाषा को भूलते जा रहे हैं । जिन विदेशियों को हम हमारे देश में घूमते-फिरते देखते हैं, वो सब केवल हमारी संस्‍कृति की वजह से है और यह हमारे लिये बड़े गर्व की बात है, परन्‍तु हमें एक पल ठहरकर यह भी सोचना चाहिये कि हमारी जिस संस्‍कृति ने सभी को आकर्षित कर रखा है, हम खुद ही उस संस्कृति को भूलते जा रहे हैं ।

इतनी बात करने पर शायद हर किसी के मन में मातृभाषा व हमारी संस्‍कृति के प्रति‍ भक्ति भाव उमड़ आये और वो अपनी मातृभाषा के लिये कुछ करना भी चाहता हो, परन्‍तु कैसे और क्‍या ?

इसका जवाब हिन्‍दीलेखक.कोम (http://hindilekhak.com/)  के रूप में सामने आया है । यह हिन्‍दी व हिन्‍दी प्रेमियों के लिये एक उत्‍कृष्‍ट मंच है । इस पर आप अपने अपने अनुभव साझा कर सकते हैं, फिर चाहे वह कविता, कहानी, लेख, समाचार, अनुभव, गीत, हास्‍य, नाटक, उपन्‍यास, आलोचना, प्रशंसा, सुझाव किसी भी रूप में हो ।

हमें अपनी संस्‍कृति व मातृभाषा के उत्‍थान हेतु, एक मंच पर एकत्रित होना चाहिये। सभी को अपने-अपने विचार बाँटने चाहिये। कुछ लोग लिखने से पहले झिझक महसूस करते हैं, सोचते हैं कि हम कोई लेखक नहीं है, क्‍या लिखें ?  उनसे मेरा निवेदन है कि वो अपनी इस सोच को बदलें, लिखने से पहले कोई लेखक नहीं होता और मैं यहाँ मात्र कविता अथवा कहानी लिखने की ही बात नहीं कर रहा ।

मान लिजिये आप सुबह अखबार पढ़ते हैं और ज़ाहिर सी बात है किसी ना किसी खब़र पर आपकी कोई ना कोई प्रतिक्रिया होगी ही, आप वही प्रतिक्रिया अपने शब्‍दों में हिन्‍दीलेखक.कोम (http://hindilekhak.com/)  पर बांटिये । लोग उसको पढ़गें, जो भी आपके विचार पर कोई प्रतिक्रिया करना चाहे वो कर सकता है, ऐसा करने से हम एक-एक करके कई लोगों की प्रतिक्रियायें पढ़ पायेंगें और लोगों को समझ पायेंगें ।

अगर आप कुछ लिखना नहीं चाहते तो लोगों का लिखा हुआ पढि़ये, अपनी प्रतिक्रिया दिजिये, ये भी एक उत्तम कार्य है । इसी बहाने आप भी लिखना प्रारम्‍भ कर देंगें। कम से कम इतना तो हम अपनी मातृभाषा के लिये कर ही सकते हैं ।

कभी राह में चलते हुये कोई अनुभव हुआ और आपको लगता है कि किसी से बाँटना चाहिये तो हिन्‍दीलेखक.कोम (http://hindilekhak.com/) से बाँटिये, यहाँ आप किसी एक से ना बाँटकर, एक समुदाय से बाँटेंगें, साथ ही शायद आपको कोई प्रतिक्रिया भी मिले, भले ही वो कटु प्रतिक्रिया हो पर कम से कम किसी ने आपको पढ़ा तो है ।

मैंने यहाँ केवल हिन्‍दी भाषा की ही बात नहीं की है, अपितु हमारी समस्‍त क्षेत्रीय भाषाओं को हमारी आवश्‍यकता है, हमें अपनी क्षेत्रीय संस्‍कृति को विकास प्रदान करने की आवश्‍यकता है । आप अपनी किसी क्षेत्रीय संस्‍कृति यथा पर्व-त्‍यौहार आदि के बारे में भी लिखेंगें तो कई लोगों को उसे पढ़ कर अन्‍य क्षेत्रों की संस्‍कृतियों के बारे में पता चलेगा ।

अत: सारांश में मैं यही कहूंगा कि यदि हमें वास्‍तव में अपने देश, अपनी संस्‍कृति, अपनी मातृभाषा के लिये कुछ करना है तो हिन्‍दीलेखक.कोम (http://hindilekhak.com/) जैसे हि मंच की आवश्‍यकता है जिस पर हम आपस में जुड़ सकें । अपने विचार, अपनी संस्‍कृति, अपने अनुभव, अपनी रचना आदि से दूसरों को परिचित करा सकें एवं दूसरों के अनुभवों, संस्‍कृतियों, रचनाओं आदि से स्‍वयं परिचित हो सकें ।  इसलिये खुद लिखिये, ओरों का पढि़ये एवं अन्‍यों को जोडि़ये।

“यह आवश्‍यक नहीं कि आप कैसे लिखते हैं, बल्कि यह आवश्‍यक है कि आप लिखते हैं ।

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