यथार्थ

यथार्थ

By |2017-07-17T18:45:22+00:00July 17th, 2017|Categories: धारावाहिक|0 Comments

यथार्थ

(अध्याय-1)

एक ढ़लता दिन और बारिश के पानी से तर एक लहराती, पहाड़़ी सड़क। देवदार की पत्तियों पर अटकी बूंदे झाड़़ते सर्द झोंके, बादलों के आते-जाते गुबार, और पहाड़़ की सतह पर उगी काई की ठण्डी महक।

फुटपाथ पर खड़ी इस काले रंग की एम्बेसेडर कार की छत पर उंगलियॉ टकटकाते हुए आकाष ने चुपचाप सुधा को ताका, और फिर एक लम्बी-भारी सॉस खींचतें हुए दोनों हाथ पेन्ट की जेबों में डाल लिये। “ये क्या बचपना है सुधा?”
सुधा जस की तस है। अभी भी सैंकडों फीट गहरी खायी को ही तके जा रही है। इस तरफ देख नहीं रही, हिल तक नहीं रही-एक नाराज़, मग़र बेहद खूबसूरत मूरत सी।
मुस्कुराते हुए आकाष ने अपने बालों पर हाथ घुमाया। “बहुत जिद्दी है।” उसके पास जाकर वह खुद से कुछ आठ इंच कम इस लड़की के चेहरे के ठीक सामने अपना चेहरा लाया, और- “तुम ने गाड़ी का स्टीयरिंग भी दो-तीन बार ही पकड़ा है।” वह मुस्काया
“मैं चला तो लेती हूॅ।” एक बात बोल कर उसने यूॅ मुॅह फेर लिया मानां अब ज़िन्दगी भर बात नहीं करेगी। उसे मुॅह फेरना ही पड़़ा, वर्ना आकाष के चेहरे पर देखते ही उसका ये बनावटी गुस्सा बोल जायेगा। जाने क्या बात है उसकी प्यारी सी मुस्कुराहट में-,उन काली ऑखों में?
आकाष फिर मुस्कुरा कर रह गया। सीधे होकर अपनी बॉहें सीने पर बॉधतें हुए, बनावटी संजीदगी के साथ। “जानता हूॅ-, घर के सामने उस सीधी सड़क पर चला लेती हो तुम, और बैक करते हुए या तो पार्क में घुस जाती हो, या पड़़ोसी के गेट के अन्दर।” हॅसी छुपाने के लिए एक हाथ की उंगलियॉ उसने होठों पर रख लीं। “उस सीधी सड़क पर तुम से गाड़ी नहीं सम्हलती, यहॉ की पहाड़़ी सड़क पर क्या करोगी?” उसने जोर दिया
“वह दस दिन पहले की बात है…” उसने एक बार आकाष के चेहरे पर देखा। “… और ये सड़क तो बिल्कुल खाली है। सिर्फ पॉच किलोमीटर ही तो और जाना है हमें, चलाने दो ना? फिर आप भी तो हैं मेरे साथ, प्लीज़?”
“सुधा अन्धेरा होने लगा है। और सड़क गीली है अभी, जिस तरह तुम ब्रेक लगाती हो, गाड़ी स्लिप कर सकती है। तुम्हारी खुषी के लिए मैं तुम्हें खतरे में नहीं डाल सकता-,”
“आपको मेरी कसम-, अब?” सुधा ने अपने तरकष का आखिरी तीर छोड़़ा, और बड़ी-बड़ी मुस्कुराती हुई ऑखों से आकाष को ताकने लगी।
आकाष ने एक तरफ देखते हुए गहरी सॉस छोड़ दी-,बस।
जब से ये बहस षुरू हुई थी, तभी से जानता था कि वही हारेगा, और वही हारा भी। उसने बे-मन से चाबी सुधा के हाथ में दी और चुपचाप जाकर गाड़ी में बैठ गया। सुधा ने जाकर स्टीयरिंग व्हील पकड़ा और चोर नज़रों से आकाष की ओर देखा। उसके सीट बैल्ट लगाने के तरीके से ही जाहिर है कि वह नाराज़ है, लेकिन सुधा उसे मना लेगी। उसे मनाना मुष्किल नहीं होता, वह जानती है। उसने मुस्कुराहट जारी रखते हुए गाड़ी स्टार्ट कर दी।
दस-बीस कदम की दूरी तय करते ही सुधा के चेहरे से वह हल्की-फुल्की घबराहट भी खत्म हो गयी जो आकाश की फिक्र के चलते थी। अब उसे गाड़ी चलाने में मज़ा आने लगा है। खूबसूरत मौसम और एक खूबसूरत रास्ता, और आकाष का साथ-, वह तो ज़िन्दगी भर इस गाड़ी को चला सकती है। अन्दर ही अन्दर कुछ गुदगुदा रहा है उसके जज़्बातों को। लेकिन दूसरी तरफ आकाष को गुदगुदा रहा है एक अजीब सा डर। सुधा की खुषियॉ छोटी-छोटी ही होती हैं, मग़र आज़ उसकी इस छोटी सी खुषी पर आकाष को अपनी ज़िन्दगी दॉव पर लगानी पड़़ी है, और उसकी ज़िन्दगी का मतलब अपनी सॉसें नहीं है… वह सॉसें है सुधा की।
एक गहरे मोड़ पर जैसे ही सुधा ने गाड़ी घुमायी, उसकी सॉसें थम गयीं, और छूटी तब, जब वह सकुषल पार हो गया।
सड़क दूर तक खाली पड़़ी है, लेकिन फिर भी जितनी बार सुधा सड़क के मोड़ पर गाड़ी घुमा रही है, आकाष घबरा सा जाता है। वह अपनी सीट से थोड़ा आगे आ जाता है, और उसके सधे हुए हाथ खुद ही स्टीयरिंग के पास चले जातें है। “गाड़ी मुझे चलाने दो, प्लीज़।” भौंहें सिकोड़ते हुए उसने सुधा से फिर कहा।
“आप मुझे डरा रहे हैं।”
आकाश वापस अपनी सीट पर टिक गया। “तो ज़रा आराम से चलाओ न? और मुझे घूरने के बज़ाय अपनी नज़रें सड़क पर ही रखो।”
खिड़की पर कोहनी टिकाये बैठे आकाष की तर्जनी लगातार अंगूॅठें के पोर को मसल रही है। वह जताना नहीं चाहता कि कितना डरा है-,घबराया है। गाड़ी पर सुधा का हाथ साफ नहीं है। “काष कि मैं आज़ उसकी जिद ना मानता।” वह बुदबुदाया।
स्पीडोमीटर की सुई 35 से 40 के बीच ही तैर रही है। सुधा ने आधे से ज्यादा रास्ता आराम से तय कर लिया, और उधर आकाष बस ये ही अन्दाज़़ा लगा रहा है कि अब और कितने मोड़ बाकी है? होटेल पहाड़़ की लगभग चोटी पर है, और गाड़ी जितना फासला तय करती जा रही है, उसके साथ दूसरी तरफ खाई की गहराई बढती जा रही है। ऐसे ही एक गहरे मोड़ पर आकाष खाई की तरफ देख रहा था, कि अचानक हार्न की तेज आवाज के साथ किसी ट्रक की हैड लाईट्स उसकी ऑखों पर पड़़ी।
“सुधा..!!” वह चिल्लाया। स्टीयरिंग पर अनायास ही चले गये उसके हाथों ने गाड़ी को बॉयी ओर से आ रहे ट्रक से बचाने के लिए दॉयीं तरफ घुमा दिया। सुधा के पैर ब्रेक पर पूरी तरह दब गये, लेकिन गाड़ी फिर भी गीली सड़क पर फिसलती हुई खाई के मुॅह पर झूलने लगी। आकाष और सुधा ने डर से कॉपते चेहरों से एक दूसरे को देखा, और जब तक उनका दिमाग कुछ समझ पाता, गाड़ी पूरी तेजी से खाई पर फिसलती चली गयी।
“आकाष…!” सुधा की चींखं उसके होटां तक आते ही छिछक कर समीक्षा की ऑखें अपने बिस्तर पर खुलीं। उसकी सॉसें धौंकनी सी चल रहीं हैं। ऑखों के सामने सफेद छत पर लटकता पंखा है, बिल्कुल स्थिर। उसने दो बार पलकें झपकायीं। खुद को अपने बिस्तर पर महसूस करते ही उसने गर्दन घुमा कर दीवारघड़ी देखी, जो रात के ढ़ाई बजा रही है।
एक भारी सॉस के साथ उसने कोहनी के बल उठकर, मेज पर रखा पानी का गिलास उठाया और घूॅट भरकर फिर उसी तरह सो गयी।
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अगली दोपहर तीन बजे।
ओल्ड स्कॉलर्स रोड के किनारे देवदार के हरे पेड़ों से घिरा आर्मी स्कूल, इस अप्रेल षुरूआत की रिमझिम में भीग रहा है। सर्दियॉ मसूरी की सर्द पहाडियों से विदा लेने को हैं।
17 साल की समीक्षा मिसेज नायर के अन्धेरे लैब में बैठी अपनी बड़ी-बड़ी बादामी ऑखों से मोमबत्ती की लौं को एकटक देख रही है। मासूम खूबसूरती से तराषे हुए उसके कंटीले नैन-नक्ष आज़ थोडे और कंटील हो गये है। हड्डियों से चिपकी त्वचा वाली उसकी पतली उंगलियॉ कुर्सी के हत्थों को मसल रहीं है। उसने दो गहरी सॉसें और लीं। वह सब्र छोड़ना नहीं चाहती।

पिछले 25 मिनट से मिसेज नायर उसे सम्मोहित करने की कोषिष में हैं, जिसके लिए समीक्षा से ज्यादा उतावली वह खुद हैं। बमुष्किल ही कोई बच्चा इनका सब्जैक्ट बनने को तैयार होता है। समीक्षा को भी नेहा मनाकर यहॉ लायी, वर्ना वह तो यहॉ आने को राज़ी ही ना थी। मग़र अब उसे भी लग रहा है कि बेकार ही उसकी बातों में आ गयी वह। आज़ उन्हें स्कूल में सिर्फ इम्तेहान के एडमिट कार्ड लेने आने था, जिसमें उन्हें बस एक घण्टा लगता, मग़र नेहा की वज़ह से दोगुना वक्त लग गया। उसके चेहरे पर आते-जाते भाव और अन्धेरे कोने में बैठी नेहा की तरफ षिकायती नज़रों देखना जाहिर कर रहा है, कि वह मिसेज नायर की इन कोषिषों से थक चुकी है-ऊब चुकी है, लेकिन टीचर ने अब तक हिम्मत नहीं हारी। नाक पर मोटे से लैन्स का चष्मा चढाये, पूरी तन्मयता से वह अपनी रटी हुई पक्तिंया बोले जा रहीं हैं। उनका स्वर हर पंक्ति पर उठता जा रहा है।
एक बार समीक्षा की ऑखें मोमबत्ती की लौं से हटकर मिसेज नायर के चेहरे पर गयीं। बेहद कोमल आवाज में चार कठोर लव्ज़ उसके होठों से जैसे खुद निकल गये। “इट्स इ षिट् थिंग!” उसने मोमबत्ती की लौं पर फूॅक मार दी।
लौं से धुॅआ उठते ही मिसेज नायर का ध्यान टूटा। “क्या हुआ?” उनका मुॅह खुला है
“मैम, आप ये सब रहने दीजिये।” थोड़ा झिझकते हुए वह कुर्सी से उठी। अपना बैग दॉयें कन्धे पर लेते हुए- “आप कुछ बता सकतीं है, तो बस इतना बता दीजिये, कि क्या ऐसे सपने सामान्य हैं?”
मिसेज नायर ने किसी अज्ञात भय के साथ पुतलियॉ फैला लीं। “आई डोन्ट थिंक सो।” अपनी कुर्सी से उठते हुए। “बचपन से तुम लगातार एक ही सपना देख रही हो, यह सामान्य कैसे हो सकता है?”
“आई करैक्ट-,” समीक्षा ने टोका “सिर्फ एक-ही-सपना नहीं देखती, एक-ही-इन्सान-का सपना देखती हूॅ।” समीक्षा ने लव्ज़ों को तोड़-तोड़ कर कहा।
“स्टिल-,” दोनां हाथ समीक्षा के चेहरे के आस-पास घुमाते हुए, काफी गहरी आवाज में। “जरूर कोई राज़ है इसके पीछे।” समीक्षा ने अटपटे से उसे देखते हुए गर्दन पीछे की। “अग़र तुम हिप्नोटाईज हो जातीं तो वह राज़ मैं तुम्हें बता सकती थी।”
फिर वही जवाब!
इन्हें तो किसी सर्कस का जादूग़र होना चाहिये। समीक्षा ने नेहा की ओर एक बार देखा। “नहीं…। आप रहने ही दीजिये। थैंक्स।” कन्धे पर बैग के फीते को ठीक करती वह लैब के दरवाज़े की ओर बढ गयी।
“बैस्ट ऑफ लक फॉर योर एक्जॉम्स!” पीछे से मिसेज नायर चिल्लायीं।

समीक्षा जानती है कि जिसे अपनी समस्या बता रही है, उसे समझ नहीं आयेगी। उसे ही क्या किसी को भी समझ नहीं आयेगी। हॉस्टेल में कोई नहीं समझा-,नेहा नहीं समझ सकी-,यहॉ तक कि वह खुद नहीं समझ पायी आज़ तक।
सोच में तेज-तेज उठ रहे उसके कदम बरामदे की सीमा तक आते ही रूक गये। बारीष ने थोड़ी तेजी पकड़ ली है। गुज़रती सर्दियों की बारिष है, भीगना सही नहीं होगा। उसने अपने आस-पास नज़रें घुमायीं। इस समय या तो स्टॉफ रूम में दो-चार अध्यापक हैं, या मैदान में भीगते हुए फुटबाल खेल रहे कुछ सरफिरे लड़के। इसके अलावा पूरा स्कूल सुनसान है। ठण्डे हाथ ब्लेजर की जेबों में डाले, एक गेरूए खम्बे से टिक कर समीक्षा बारीष के मूढ़ का अन्दाज़ा लगाने लगी-,षायद रूके?
टिन के नालीदार छज्जे से टपकती बूॅदों के बीच उसने अपना दॉया हाथ बढाया। ठण्डे पानी के स्पर्ष से छन्न कर, उसके रोंगटें उठ गये। उसकी दूधिया-पतली उंगलियॉ पानी में भीग कर और निखर आयीं। हथेलियॉ, और उंगलियों के पोर, और ज्यादा गुलाबी हो गये।
बचपन की तरह बारीष देखकर आज़ भी उसके अन्तर में गुदगुदी सी हो उठती है। कुछ देर पहले उसकी नज़रें जो नाराज़ सी थीं, अब नर्म हो गयीं हैं। ये बादल….धुंध….बारिष की छनछनाहट….भीगती सड़कें और झूमते पेड़, अक्सर उसे किसी के बेहद करीब कर देते हैं। लगता है जैसे उसका कोई अपना, अन्जाने ही उसके बहुत करीब से गुजर गया हो। उसका खाली सा मन किसी की कमी के एहसास से भर जाता है, और वह खुद से ही सवाल करने लगती है, कि क्या है जो कम है इस खूबसूरत माहौल में? कौन है जो उसकी पूरी दुनिया में बिखरा हुआ है…पूरे मौसम में घुला सा है लेकिन बस, सामने ही नहीं आता।
“तू यहॉ खड़ी है?” पीछे से एक हाथ उसके कन्धे पर पड़़ा। समीक्षा चौंककर अपने ख्यालों से बाहर आयी और पीछे देखा। हल्के भूरे रंग के ब्लंट-कट बालों को उंगलियों की कंघी से ठीक करती नेहा उसके पीछे खड़ी है। समीक्षा की ही तरह पॉच फीट-चार इंच लम्बी, और छरहरी। बस इसका रंग समीक्षा की तरह दूधिया ना होकर गेंरूआ है।
“तू कहॉ रह गयी थी?” समीक्षा ने पूछा
“सहेलियों को आखिरी बॉय कर रही थी।” इम्तेहान का एडमिट-कार्ड देखते हुए उसने ठण्डी आह भरी। “अब तो कॉलेज में ही मिल पायेगें। वो भी अग़र ये बारहवीं के एक्जॉम पास-आड़ॅट कर लें।”
“क्यों-? एक्ज़ाम देने नहीं जायेगी क्या?” एक तर्कपूर्ण बात कहकर समीक्षा ने कदम बरामदे से बाहर रख दिया।
नेहा कुछ ज्यादा ही जताती है अपने जज़्बातों को। सारी लड़कियों वाली आदतें हैं उसकी। जरूरत से ज्यादा बोलना-,जरूरत से ज्यादा हॅसना और हर छोटी बात पर रोने लगना, मग़र समीक्षा, नेहा की तरह छोटे या कमज़ोर दिल की नहीं है। वह जानती है कि मसूरी जैसे छोटे से षहर में उसे उसके दोस्त फिर कहीं ना कहीं मिल ही जायेगें, और ख़ासतौर पर तब-जबकि डिग्री कॉलेज भी गिनकर दो ही हों।
नेहा को तो अब जाकर उसका तर्क समझ आया है। उसने भी तुरन्त समीक्षा के पीछे चल देने को कदम उठा लिया और ठिठकी। “बारिष में ही जायेगें क्या?” उसने चिल्लाकर पूछा
“तेरी नायर के पास ना गये होते, तो पहले निकल सकते थे।” समीक्षा चल दी, बारिष के पानी से सराबोर ऑगन में बडे़-बडे़ डग भरती हुई।
नेहा ने अनमने से छत की सीमा पार की और उसके पीछे चल दी।
“थोड़ा धीरे चल न!” बार-बार चेहरे से बालों को हटाती हुई, नेहा उसके पीछे-पीछे स्कूल के गेट तक आ गयी। “वैसे नायर ने कोषिष तो की ही थी? अब तुझे हिप्नोटाईज करना भी तो मुष्किल है ना?”
समीक्षा एक पल को थमी।
पलटकर घूरते हुए। “अब ये भी मेरी ही गलती है?” उसने दोबारा अपनी राह ली। “मैंने तो पहले ही कह दिया था कि मुझे तेरी मिसेज नायर के पास नहीं जाना। उसे कुछ आता-जाता तो है नहीं। पूरे स्कूल में कोई गम्भीरता से लेता है उसे? सॉईको पढ़ा पढ़ाकर वह खुद साईको हो गयी है…और अग़र तू भी उसके जैसी नहीं होना चाहती, तो उसकी क्लॉस अटेन्ड करना छोड़ दे।” एक ही सॉस में काफी कुछ बक दिया उसने।
सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे खड़ी होकर दोनों बस का इन्तजार करने लगी। इस पेड़ की छॉव में कई सारे लोग बारिष से बचने के लिए जमा हैं। वैसे ये पेड़ कोई बस स्टॉप नहीं है, मग़र बसें यहॉ से गुजरते हुए ठहरती जरूर हैं।

समीक्षा इस आर्मी स्कूल से पहले, मसूरी के नामचीन इगि्ंलष मीड़ीयम हॉस्टेल में पढ़ रही थी, और वहीं का असर है कि इस आर्मी स्कूल के अनुषासन के खिलाफ उसकी जेब में हमेषा च्विगंम मिलता है। स्कूल से बाहर आते ही उसके जबडे़ जुगाली करने लगते हैं। उसके अन्दाज़, उसका रवैया, उसका आत्मविष्वास, इस आर्मी स्कूल की हर लड़की से अलग है-,और अलग चीजें तो लुभाती हीं हैं। षायद इसीलिए आस-पास से गुजरता स्कूल का हर दूसरा लड़का उसे ताकते हुए निकलता है। उसके चेहरे में-, व्यक्तित्व में एक खिंचाव है, ख़ासकर उसकी ऑखों में। अग़र कोई नज़र इनसे रू-ब-रू हो जाये, तो कुछ पल ठहर ही जाती है। दिल का सब कुछ उगल देने को तैयार हो जातीं हैं।
मग़र समीक्षा की ऑखें इनमें से किसी के चेहरे पर नहीं रूकतीं। ये नासमझ-बेलगाम-बेअदब-बचकाने से बच्चे दिखायी देते हैं उसे। जैसे उसकी अपनी उम्र और सोच इन सब से परिपक्व हो। वह बस बर्दाष्त कर रही है उन्हें, और उनके बेतुके फिकरों को, और उनकी जलील सी नज़रों को। जबडों के बीच भींच-भींचकर च्विगंम चबाते हुए, बस अन्दर ही अन्दर दुआ कर रही है कि उसे यहॉ ज्यादा देर रूकना ना पड़े। और उसकी दुआ सुन ली गयी। सामने से दो बस आ रहीं हैं।
लाईब्रेरी रोड जाती हुई एक बस को उसने हाथ दिया।
सीट पर बैठते ही नेहा ने फिर कुछ सोचकर बात छेडी। “समी वह तेरी मदद कर रही थी।”
समीक्षा ने बैग कन्धे से उताकर गोद में लिया। “वह मेरी मदद नहीं कर रही थी, वह प्रेक्टिस कर रही थी मुझ पर।”
“लेकिन तेरी भी तो गलती है न? तूने उसे आकाष और सुधा के बारे में ठीक से कुछ बताया ही नहीं।”
“क्या बताती?” उसने त्यौंरीं चढाकर नेहा को देखा। “सिर्फ दो-चार बातें सुनकर बौखला गयी थी तेरी नायर, अग़र बचपन की हिस्ट्री सुन लेती तो इस वक्त पागलखाने की एम्बुलेस ले जा रही होती उसे।”
नेहा उसकी बात से सहमत है, वाकई ऐसा हो सकता था। वह तो कल्पना तक कर सकती है उस सफेद एम्बुलेन्स की-और अस्पताल की वर्दी पहने दो वार्डबॉय की जो उसकी चीखतीं-चिल्लाती नायर मैम को जबरदस्ती खींचकर एम्बुलेन्स तक ले जा रहे हैं।
बुरा ख्याल है! उसने सिर झटका, और समीक्षा की ओर देखकर। “चल छोड़ उसे। मुझे भी बता ना कि कल रात क्या देखा था तूने?”
बस की खिड़की से बाहर च्विगंम थूक कर। “आकाश और सुधा का एक्सीडेन्ट।”
“ओह! नॉट अगेन। ये सपना तो मैं भी तीन बार सुन चुकी हूॅ।” उसने बोरियत के तौर पर ऑखें घुमायीं। “तो इस बार मर गये कि जिन्दा हैं? वैसे, मर ही गये हों तो अच्छा है, तेरे सपनों में तो आना बन्द होगा उनका।”
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हजार नाराज़गियों के बादजूद समीक्षा, नेहा से कुछ छुपा नहीं सकती। किषोरावस्था में दोस्ती सघन होने में वक्त नहीं लेती। सिर्फ दो साल पहले हुई इनकी दोस्ती भी इतनी गहरा गयी है कि दोनों के बीच कोई पर्दा नहीं रहता। जब तक एक-दूजे से बता ना दें, तब जक जैसे ज़िन्दगी में पूरी तरह कुछ घटता ही नहीं। इसीलिए एक राज़ जो समीक्षा का परिवार तक नहीं जानता, वह नेहा जानती है।
“तेरे ये सपने कितने लॉजिकल होते हैं न? मेरे सपने तो मुझे याद तक नहीं रहते, और याद रहें भी, तो कोई सिर पैर नहीं होता उनका।” नेहा ने अपनी ही खिल्ली सी उडायी, और फिर जल्द ही संजीदा भी हो गयी। “वैसे तूने तो कहा था कि अब वह नहीं आते सपने में?”
“हॉ-, इस बार भी करीब तीन महीने बाद ही दिखें हैं।”
समीक्षा ने सहज की कह दिया।
नेहा अवाक् है उसके अन्दाज़ पर। “तू इतनी कूल कैसे रह सकती है इस हालत में? तुझे अजीब नहीं लगता ये सब?”
समीक्षा की ऑखें खिड़की से बाहर ही हैं। “बचपन में मिले लोगों को सपनों में देखना, इस में अजीब क्या है?”
बस ने लाईब्रेरी रोड पर ब्रेक लगा दिये। बस में बैठे आधे लोगों की तरह समीक्षा और नेहा का स्टॉप भी यही है। यहॉ से उतरकर कुछ दो किलोमीटर पैदल चलना होगा, घर पहुॅचने के लिए।
समीक्षा और नेहा उतर गयी।
बारिष की बारीक बूॅदों से बचने के लिए दोनों के चेहरे सड़क पर झुके हुए हैं। “तो तेरी मम्मी को क्यों याद नही रहे वह दोनों?” नेहा ने सवाल किया
समीक्षा का झुका हुआ सिर ना में हिला। “जिन्हें अपनी बेटी का जन्मदिन ही याद नही रहता, उन्हें लोग क्या याद रहेगें?” समीक्षा ने नज़रें अपनी सीध में कर के कुछ सोचा। “वैसे भी पापा के हर ट्रॉन्सफर के साथ, हमारा घर और पड़़ोस बदलता रहता था। आकाष का षरीर फौजियों जैसा है।” नेहा की ओर देखकर-“हो सकता है वह पापा के बटालियन के हों, जिनके साथ हम ज्यादा वक्त नहीं रहे।”
“हमम।” नेहा ने निचला होठ दॉतों के बीच दबाये गम्भीरता से सोचा। “फिर भी एक बार खुल कर बात तो कर दोनों से-, षायद उन्हें कुछ याद आ जाये?”
“उन्हें याद दिलाने की जरूरत ही क्या है?” समीक्षा ने कन्धे उचका लिये। “उनके पास वक्त कहॉ है मेरी बातें सुनने का? कुछ बता भी दूॅ, तो उन्हें बस एक और वज़ह मिल जायेगी आपस में झगडने के लिए।” उसका सिर फिर झुक गया
“तू उनकी बेटी है समी, उन्हें वक्त निकालना होगा तेरे लिए। वह तुझे इस तरह अकेला नहीं छोड़ सकते।”
अपनेआप ही एक थकी सी मुस्कुराहट आकर लौट गयी समीक्षा के झुके हुए चेहरे से। “तू ये सब इसलिए कह रही है, कि तुझे तेरे घरवालों ने चार साल की उम्र में हॉस्टेल नहीं फेंक दिया था। तेरी नींद, भूख, प्यास मेरी तरह घड़ी की सुईयों पर नहीं चली है। होष सम्हालने पर तेरे आस-पास तेरे अपने थे, टीचर्स या हाऊॅसमदर नहीं।”
“लेकिन अब तो तू अपने मॉ-बाप के साथ है ना इडियट?”
“तो क्या करूॅ??” समीक्षा झल्ला उठी! कोई बुझती हुई आग जैसे अचानक ही भडक गयी। किसी दबे हुए तूफान ने फिर अपनी रवानी ले ली। “मुझे नहीं महसूस होता कि मैं अपने घर में हूॅ! सालों तक मैं उनके सामने रोती रही कि मुझे घर ले चलो, लेकिन किसी ने मेरी सुनी??” अपनी तेज सॉसों को सम्हालते हुए। “और जब उन्हें लगा कि अब मुझे भी परिवार की याद नहीं आती, तो ले आये जबरदस्ती यहॉ।”
समीक्षा की तेज आवाज ने आस-पास से गुजर रहे लोगों का ध्यान खींच लिया। षर्मिन्दी ने उसे कुछ देर को चुप करा दिया। नेहा और वह, कुछ दूर सिर झुकाये चुपचाप चलते रहे। मन थोड़ा हल्का होते ही उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।
चेहरे से बारिष के पानी को हाथों से पोंछकर। “नेहा में मानती हूॅ कि वह लोग मेरे अपने हैं, लेकिन मैं एक फासला महसूस करती हूॅ हमारे बीच। बात कोई भी हो लेकिन उनके सामने जाकर मुॅह नहीं खुलता मेरा। मुझे वक्त चाहिये खुद को एडजस्ट करने के लिए। और रहे ये सपने, तो वह कोई समस्या नहीं है। मुझे यकीन है कि एक दिन ये सपने आना पूरी तरह से बन्द हो जायेगा।” उसने नेहा के कन्धे पर हाथ रखा। “तो फिक्र करने की जरूरत नही है।”
नेहा की समझ में कुछ आ भी रहा है और कुछ नहीं भी। कुछ सोचकर उसने समीक्षा को समझाने के लिए अपना मुॅह फिर खोला था कि इन दोनों के बीच एक बाईक आ गयी। चष्मा पहने एक पतले चेहरे और छरहरे बदन का लड़का, बिना हैलमेट पहने बारिष में बाईक घुमा रहा है। नेहा ने समीक्षा को खामोश चलने का इशारा किया वर्ना जिस तरह वह बाईकसवार उनके बगल से लगभग छूकर गुज़रा है, समीक्षा से फटकार खा चुका होता।
तीसरा चक्कर लगाते ही वह पूरी तेजी से बाईक भगा कर उस भीगती सड़क से गायब हो गया। नेहा का चेहरा खिल उठा है उसे देखकर।
“ये ही है कपिल?” समीक्षा ने नाक सिकोडते हुए अन्दाज़ा लगाया। “चषमिष!” वह बुदबुदायी
“हॉ। एक महीने पहले ही मसूरी आया है। यहॉ किसी कॉलेज में दाखिला लिया है, और पढ़ाई पूरी होने तक अपने मामा के घर ही रहेगा।” मचलकर-“क्यूट है ना?”
वह कहना तो कुछ और चाहती थी मग़र नेहा की उम्मीदभरी ऑखों में देखकर अटक सी गयी। “अ…हॉ। बिल्कुल!” झूठ बोलने में उसे बड़ी तकलीफ होती है। उसे उम्मीद नहीं थी कि नेहा जैसी मनचली लड़की को कोई सॉवला, चष्मा पहनने वाला, दुबला सा दक्षिण भारतीय लड़का भा जायेगा।
“चल बता कि कैसा इन्सान होगा ये?” नेहा ने पूछा
“कोषिष करती हूॅ।”
कपिल का नाम तो समीक्षा पिछले हफ्ते ही सुन चुकी थी, जब कपिल ने नेहा के सामने दोस्ती का प्रस्ताव रखा था, लेकिन देखा आज़ पहली बार है। मासूम से चेहरे वाली समीक्षा लोगों के चेहरे पढ़ सकती है। ख्वाबों में डूबी सी उसकी गहरी भूरी ऑखें इन्सान के अन्तर तक को देख सकतीं है। चुपचाप नज़रें नीचीं किये वह कपिल का चेहरा, उसके हाव-भाव, नेहा की तरफ उसके देखने का तरीका, उसकी मुस्कुराहट और उसकी हर छोटी से छोटी हरकत को अपने दिमाग में दोहराने लगी। कपिल के चेहरे को अपनी ऑखों के सामने महसूस करते हुए उसने कुछ बातें कहीं। “बहुत सादा लड़का है। पढ़ाकू, समझदार, मज़ाकिया, मतलबी। जल्दि से दोस्त नहीं बनाता होगा, और सब से ज्यादा वह…अपनी मम्मी के करीब है। अपनी नाक नीची करना इसे पसन्द नहीं। खाने का षौकीन है। और हॉ, ये सच में तुझे पसन्द करता है, ऐसे ही प्रपोज नहीं किया।”
“यैस्स!!” मुट्ठी बॉधकर नेहा उछल सी गयी। “अच्छा और कुछ बता?” उसने चलते हुए समीक्षा के दोनों कन्धे थाम लिये।
“और-?” उसे अचरज से देखते हुए। “और क्या बताऊॅ?” समीक्षा ने उसके हाथ कन्धों से उतारे-“तू क्या उसी से षादी करेगी, जो इतना जानना चाहती है उसके बारे में?” वह रास्ते में दो-चार कदम आगे बढ गयी।
नेहा अपनी उम्र की लड़कियों की तरफ टहलती, मचलती, मुस्काती सी उसके पीछे-पीछे है। “क्या पता? लेकिन इसे हॉ कहने से पहले इसके बारे में सब कुछ पता होना चाहिये न?”
एक बार पलटकर उसने नेहा के चेहरे पर देखा। “छि! तू अभी से तू बॉयफ्रेन्ड बनाने वाली है?”
“और नहीं तो?” बॉहें उठाते हुए। “हमारी सारी सहेलियों के बॉयफ्रेन्डस हैं। लेकिन तू चिन्ता मत कर, मैं तुझ पर जोर नहीं डालूॅगीं। तू बुढापे में ही बॉयफ्रेन्ड बनाना।”
“हा हा, वैरी फनी। चल बॉय।” समीक्षा के कदम एक मकान के सामने आकर थोडे धीमे हो गये।
नेहा ने अपने घर का गेट खोला। बरसती बूॅदों को देखते हुए-“थोड़ी देर मेरे यहॉ रूक जाती?”
“नहीं, पापा आये हुए हैं। पहॅुचते ही उनकी गज़लें सुननी पड़ेंगीं। आज़ मम्मी भी बुटिक नहीं गयीं थी, और जहॉ तक मैं जानती हूॅ इस वक्त उन दोनों के बीच बहस चल रही होगी।”
“ओ के बॉय। लेकिन हो सके तो उनसे एक बार बात जरूर करना अपने सपनों को लेकर।” नेहा ने फिर एक तंग सी मुस्कुराहट के साथ निवेदन किया।
समीक्षा ने उसकी तरफ से चेहरा फेरते हुए ऑखें मींचकर बस एक गहरी सॉस छोड़ दी।

समीक्षा, नेहा से कहीं ज्यादा यथा्र्तवादी है। उसके घर का माहौल और हॉस्टेल में हुई उसकी परवरिष उसे इन सपनों को अपने यथार्थ् से जोड़ने की इज़ाजत नहीं देती। उसके लिए सिर्फ वही सच है जो खुली ऑखों से दिखायी देता हो, जिसे वह छू सके, जिसकी एक षुरूआत हो और साथ ही एक अन्त। फिर भी जाने क्यों उसे आकाश और सुधा से अन्जाना सा लगाव है? उनमें एक अलग सा अपनापन है, जिसे महसूस करना जितना आसान है, बयान करना उतना ही मुष्किल।

समीक्षा के पिता रंजन षर्मा फौज से विरत है, और अपनी एक प्राईवेट नौकरी के चलते वह ज्यादातर मसूरी से बाहर ही रहते हैं, लेकिन जितना वक्त वह परिवार के साथ बिताते हैं, वह वक्त परिवार के लिए जेल जैसा हो जाता है। चूंकी रंजन जी ने फौज की सख्त ज़िन्दगी देखी थी, इसलिए उन्हें भावनाएं, जज़्बात ,सपने, उम्मीदें, यकीन या इस तरह का कोई भी षब्द जो दिल या आत्मा से जुड़़ा हो, कम समझ आता है।
चित्रा जी की इच्छा से समीक्षा को चार साल की उम्र में हॉस्टेल में डाल दिया गया था, और आज़ से लगभग दो साल पहले, रंजन जी की इच्छानुसार उसे इंग्लिष मीडियम हॉस्टेल से उठाकर आर्मी स्कूल में भर्ती करवा दिया गया। उनके मुताबिक वह वहॉ रहकर अपने परिवार को भूलती जा रही थी। अब मिस्टर और मिसेज षर्मा, समीक्षा से उम्मीद रखतें हैं कि वह खुद को परिवार का हिस्सा समझे, लेकिन समीक्षा के लिए ये आसान नहीं। आज़ भी वह घर में सिर्फ उतना ही कहती-सुनती है, जितना ज़रूरी हो, और बाकि वक्त वह या तो नेहा से बातें करते हुए गुजार देती है, या अपने कमरे में बन्द होकर पढ़ते हुए, या गाने सुनते हुए। उसके कमरे के बन्द दरवाज़े के अन्दर उसकी पूरी दुनिया सिमटी हुई है। बिल में रहने वाले किसी सरीसृप की तरह वह जरूरत होने पर ही वहॉ से निकलती है।

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स्कूल बैग कन्धे से उतारते हुए वह एक घुमावदार, सड़क के किनारे ठहरी। ईटों से बनी कुछ दस सीढ़ियॉ ऊपर चढने के बाद समतल जमीन का एक छोटा सा टुकडा है, जिस पर उसका घर बना है। लाल और सफेद रंग के इस छोटे, मग़र खूबसूरत मकान की छत, पहाड़़ों पर बनने वाले मकानों की तरह झोंपड़़ी के आकार की नहीं। उसका कुछ आधा हिस्सा, जो कि छत का मध्य है, समतल छोड़ दिया गया है, क्योंकि चित्रा जी और रंजन जी की बस एक ही पसन्द मिलती है, और वह है छत पर टहलते हुए चाय पीना।
यहॉ, गेट से दिखायी दे सकता है घर का अगला पूरा हिस्सा। चार स्तम्भों पर थोड़ी झुकी हुई लाल रंग की ड्योढी और लकड़ी के खुले बरामदे के बीचोंबीच मुख्य-द्वार। मुख्य-द्वार के दॉयें-बॉयें, चार-बॉय-चार की दो खिड़कियॉ है, जो हॉल में खुलती हैं।
समीक्षा ने गेट खोलकर सीमेंन्ट की पगडन्डी पर कदम रखा, ये ऑगन के मध्य से चलती हुई बरामदे पर ठहरती है। मकान की चारदीवारी बॉस की बनी है, जिसके साथ चलती है डेलिया, गुलाब और लीली के रंगीन फूलों की कतारें, ये समीक्षा के अथाह प्रकृति-प्रेम का परिणाम है। उसके आने से पहले यहॉ सिर्फ घास होती थी, उसी ने इस सूने ऑगन को बगीचे में बदला था। इस पगडन्डी और मकान के चारों ओर कुछ चार फीट तक गढे स्लेटी मार्बल को छोड़कर, बाकि सारी ज़मीन पर मखमली घास बिछी हुई है।
मसूरी एक पहाड़़ी पर्यटन स्थल है, और ख़ासा महॅगा भी। यूॅ तो यहॉ से सर्दियॉ कभी विदा नहीं लेतीं, फिर भी साल तीन महीने लोग गर्म कपड़़ों के बिना गुजार लेते हैं। यहॉ पड़ने वाली आठ महीने की सर्दियॉ रोजमर्रा के खर्चों को भी आठ गुना कर देतीं हैं। रंजन जी भी आज़ परिवार का खर्च चलाने के लिए अपनी नौकरी के साथ चित्रा जी के उस बुटिक पर निर्भर हैं, जो एक वक्त में उनकी रजा नहीं था। वह एक मध्यमवर्गीय विरत फौजी हैं, जिन्होंने रिटायरमेन्ट पर मिली सारी रकम इसी मकान पर लगा दी।
लकड़ी के बरामदे पर जूतों की ऐडी टकटकाते हुए समीक्षा मुख्य द्वार तक पहुॅची। दरवाज़े के हत्थे पर हाथ रखते हुए उसने गीले जूते पायदान पर रगड़े और अन्दर चली गयी।
उसका अन्दाज़ा आज़ भी सही साबित हुआ है। जैसा उसने कहा था-घर का माहौल ठीक वैसा ही है। सोफे के एक कोने में रंजन जी अखबार की आड़ में बडबड़ा रहे हैं, और चित्रा जी दूसरे कोने में बैठीं, फैषन मैंग्जीन की आड़ में। समीक्षा ने कभी चुम्बक के समान धु्रवों के बारे में पढ़ा था, जिनके बीच इतना जबरदस्त विपरीत दवाब होता है, कि वह कभी करीब आ ही नहीं सकते। जब-जब वह अपने माता-पिता को देखती है, उसे उन धु्रवों की याद आ जाती है। 15 साल का उसका छोटा भाई अरूण इनके रोज के झंझटों का आदि हो चुका है, और वह मम्मी-पापा की बहस को पूरी तरह से नजरअन्दाज़ करके मषरूफ है डिस्कवरी चैनल पर दिखाये जा रहे जानवरों को देखने में। उसे इनकी इस बेतुकी बहस से फर्क नहीं पड़ता, लेकिन समीक्षा के लिए ये सब झेलना हमेषा ही मुषिकल रहा है।
वह बिना किसी का ध्यान खींचे चुपचाप हॉल के बॉयी ओर की गैलरी में दाखिल हो गयी, जो कि उसके अपने कमरे पर खत्म होती है।
स्कूल बैग बारिष से नम हो चुका है। उसने सारी किताबें और रजिस्टर बाहर निकाले और बैग वहीं दरवाज़े के बगल में छोड़ दिया। कोट उतारती हुई वह चली आयी अपने कमरे की एकलौती, छरू बॉय छरू फीट की बड़ी सी खिड़की के पास। इस खिड़की में सलाखें नहीं हैं। उसने कॉच के बने दोनों पल्ले बाहर धकेले और खिड़की पर चढकर बैठ गयी। पिछले ऑगन में हरी घास के बीच रात की रानी की झाड़ है, जिसकी खुषबू से भरी हवा, खिड़की खोलते ही सीधे समीक्षा के कमरे में भर जाती है, मग़र इस वक्त वह खुषबू ना के बराबर है। इस 12 स्केव्यर फीट के कमरे में बीच में एक पलंग है, उसके सिरहाने पर एक स्टूल, जिस पर एक टेबल-लैम्प है। बहुत आसान हो जाता है उसके लिए बिस्तर पर कम्बल ओढकर देर रात तक पढ़ना, और जब नींद आये तो उसी स्टूल पर किताब रखकर लैम्प का स्विच ऑफ कर सो जाना। इसी आदत के चलते समीक्षा के इस कमरे में पढ़ने के लिए मेज तो है, मग़र उसके सामने कुर्सी नहीं। वह या तो बिस्तर पर बैठ कर पढ़ती है, या अपनी खिड़की पर। उसका बड़ा सा स्टडी टेबल उसके बाकि के सामान रखने के काम आता है। उसका लैपटॉप, म्यूजिक सीडीज, किताबें सब कुछ उसी पर सजा रहता है।
उसके पंलग के बॉयी ओर दीवार के साथ सटकर खड़ा है उसका ड्रेसिंग, जो कि कभी उसकी दादी इस्तेमाल करती थीं। पलंग के दॉये पतियाने के पास एक लकड़ी की अलमारी है, और बॉयें पतियाने की ओर एक और छोटा सा दरवाज़ा, जो उसके कमरे से लगे उसके निजी हमाम में खुलता है।
समीक्षा के कमरे का रख-रखाव पिछले दो सालों से नहीं बदला, क्योंकि इस छोटे से कमरे में अग़र एक कुर्सी भी हिलानी हो, तो बहुत गणित लगानी पड़ती है।
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नीले रंग का एक ढीला स्वेटशर्ट सिर से डालती हुई समीक्षा अपने कमरे के दरवाज़े से बाहर निकली। बाहर बैठक में खामोषी है, मतलब मम्मी-पापा इस वक्त वहॉ नहीं है। ठीक सामने अरूण के कमरे का अधखुला दरवाज़ा है। उसने अन्दर झॉका। अरूण फर्ष पर कई फोटो एलबम और बहुत सी तस्वीरें बिखेर कर बैठा है। घर के बाकि कोनों की तरह समीक्षा को इस कमरे में जाते हुए झिझक नहीं होती। इस घर के सब से कम उम्र के इस सदस्य का स्वभाव सब से ज्यादा परिपक्व जो है।
“ये क्या कर रहा है?” समीक्षा कमरे के अन्दर आते हुए बोली
“कुछ नहीं, बस टाईमपास कर रहा हूॅ।” अरूण ने आखिरी एलबम हाथ में ली और उसकी तस्वीरों में कुछ ढूॅढ़ने लगा।
उसके पास घुटनों पर बैठते हुए-“सिर्फ टाईमपास करने के लिए इतनी मेहनत?” वह मुस्कुरा गयी। उसे नज़रें तिरछी कर के देखते हुए। “यकीन करने का मन नहीं कर रहा।”
“तो फेस रीड कर के पता कर ले कि क्यों कर रहा हूॅ?” अरूण ने षरारत के साथ कहा, और उस एलबम में से अपने बचपन की एक ऐसी फोटो निकाल कर अलग रख ली जिसमें वह बहुत प्यारा लग रहा है।
समीक्षा की नज़र भी उस फोटो पर एक बार पड़़ी और वह सब समझ गयी। “उसका नाम क्या है?”
“हिना।”
“मुसलिम है?”
“तो क्या हुआ?” कन्धे उचाकर। “वैसे तुझे कैसे पता चला? फेस रीडिंग?”
“नहीं, कॉमन सेन्स है। तू अपने बचपन की क्यूट सी तस्वीर किसी ख़ास के लिए ही तो निकालेगा?”
अरूण के बचपन की वह तस्वीर एक बार समीक्षा ने भी हाथ में ली, और उसके बाद अतीत को दोहराने का ऐसा चसका लगा, कि दोनों ने वहॉ रखी करीब आधी दर्जन एलबम देख डालीं। इन पुरानी तस्वीरों में कई वह गुजरे नज़ारे कैद हैं जिन्हें देखते ही कुछ ऐसा याद आ जाता है, कि दोनों मुस्कुरा जाते है। दादा-दादी, पीले और हरे रंग से रंगा लकड़ी का घोडा, तीन पहिये वाली लाल साईकिल, पुराना आर्मी क्वॅाटर…कुछ भूले हुए दोस्त। आज़ यकीन करना मुष्किल है कि ये सब कभी उनकी ज़िन्दगी की अहम हिस्सा थे। पटरी पर दौड़ती ज़िन्दगी न जाने ऐसे कितने ही नज़ारों की झलक दे देकर आगे बढती गयी, और आज़ उन्हें कहॉ से कहॉ ले आयी है?
इन तस्वीरों के अलावा आज़ कोई सबूत बाकि नहीं है, कि पड़़ोस के अंकल ने कभी षरारत करने पर उन्हें मुर्गा भी बनाया था। कभी समीक्षा अपने दो साल के भाई को साईकिल पर बैठाकर ऑगन का चक्कर भी लगाती थी। कभी उनके घर में सफेद रंग का एक कुत्ता भी होता था-डॉगी। इन तस्वीरों को देखते हुए समीक्षा के जेहन में अचानक कुछ अटक गया। अरूण सारी एलबम समेट कर उठ रहा था कि-“इन्हें मैं रख दूॅगी। मुझे भी कुछ ढूॅढ़ना है इनमें।”
“क्या ढूॅढ़ना है?” अरूण ने उसकी तरफ देखते हुए एलबम वापस फर्ष पर छोड़ दीं।
सोचते हुए। “वो…। तेरे पास मैंग्नीफाईन ग्लास है क्या?”
समीक्षा को ख्याल आया, कि अग़र आकाष या सुधा उसकी ज़िन्दगी में कभी थे तो, इन तस्वीरों में कहीं न कहीं जरूर मिलेगें। हो सकता है वह लोग उनके इतने करीबी ना रहे हो, कि चित्रा जीं उन्हें याद रख सकें, लेकिन तस्वीरों में हर उस इन्सान का चेहरा होगा जिन्हें वह उस वक्त जानते थे।
समीक्षा ने दोबारा सारी एलबम खोल लीं।
ये सारी तस्वीरें समीक्षा चौथे जन्मदिन के बाद की है, जो इस परिवार के साथ उसका आखिरी जन्मदिन था, इसलिए कुछ दस-बारह तस्वीरों के बाद समीक्षा हर एलबम से गायब थी। ये तस्वीरें ही बता रही हैं कि उसके हॉस्टेल चले जाने के बाद भी कई ऐसे मौके आये थे, जिनमें पूरा परिवार साथ था-, खुष था, लेकिन समीक्षा की कमी किसी के चेहरे पर नहीं दिख रही। अपने बचपन को लेकर ये छोटी सी बात, उसे आज़ से पहले कभी नहीं चुभी थी। मग़र अनुकूलन की खासियत के चलते आज़ भी ये चुभन कुछ देर उसके चेहरे पर रही, फिर तस्वीरों के पलटने के साथ उसके चेहरे से मिटती चली गयी।
वह किसी भी बात पर जरूरत से ज्यादा ध्यान नहीं देती।
बडे़ गौर से समीक्षा एलबम के पन्ने पलट रही है। कोई भी चेहरा वह चूकना नहीं चाहतीं। आकाश या सुधा में से किसी एक की भी झलक मिल जाये, तो उसे वह सिरा मिल जायेगा, जिसे पकड़कर चलते हुए वह उन दोनों तक पहुॅच सकती है-या कम से कम उनकी सच्चाई तक?
एक-एक कर समीक्षा ने सारी एलबम देख डाली। हर एक तस्वीर में दिख रहे इन्सान को ऑखे गाढ़ कर देखा, मग़र किसी में भी उन दोनों का चेहरा नहीं है। थोड़ी निराषा के साथ उसने आखिरी एलबम बन्द की। एक अच्छा भला मौका जैसे उसके हाथ से निकल गया। उसने अरूण की तरफ देखा। वह अपने बिस्तर पर लेटा मोबाईल पर किसी से चैटिंग कर रहा है।
“हमारे पास और तस्वीरें नहीं है? जिसमें हम और छोटे रहे हों?” उसने अरूण से पूछा
“अमम्…। कुछ दो-चार एलबम और कुछ फ्रेम्ड फोटोगा्रफ है। लेकिन वह सब मम्मी ने स्टोर में बन्द कर रखीं है।”
कुछ सोचकर। “चाबी कहॉ है उसकी?” समीक्षा ने सवाल किया।  क्रमश:

 

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