काश्मीर की नारी

काश्मीर की नारी

अचरज है कि भूल गई तुम या तुमको यह ज्ञान नहीं,
अक्टूबर’४७ के बर्बतम महीने का तुमको क्या भान नहीं,

जम्मू व कश्मीर पर महाराजा हरि सिंह का था स्वतंत्र प्रभार,
जब कश्मीर के उरी क्षेत्र से किया पाक नें छुप कर वार,

पाक सेना के जवानों ने कबायली भेष धरकर की लूटमार,
महाराजा को तब लगानी पड़ी भारतीय सेना से रक्षा की गुहार,

स्वेच्छा से उन्होंने १९४७ में विलय के दस्तावेज पर संधि करी,
तुरंत भारतीय सेना की टुकड़ी श्रीनगर हवाईपट्टी आन खड़ी,

मेजर सोमनाथ शर्मा के नेतृत्व में ‘ओल्ड एयरफील्ड’ युद्ध लड़ा,
उनके अदम्य साहस के लिए उन्हें प्रथम परम वीर चक्र मिला,

इधर पाक सेना का जारी था रूह कंपा देने वाला नरसंहार,
तीन रोज़ सोपोर रूक किया उन्होनें हर स्त्री,बच्ची व मरीज़ का बलात्कार,

गिद्ध बनकर नोंचते रहे वह घाटी के र्निदोष औरत, बूढ़े और बच्चे को,
हैवान बन कर लूटते रहे वो हर माँ, बेटी, बहन की अस्मत को,

ऐसे नापित का साथ निभानें तुमनें मोर्चा आखिर क्यों खोला?
क्या तुमसे इतिहास के पन्नों में जमा अपनों का रक्त नहीं बोला ?

सच्चाई से वाकिफ़ होकर भी क्या तुम्हारा खून नहीं खौला ?
ऐसा निर्णय लेने के पहले सच्चाई को क्यों न तुमने तौला?

जिन हाथों नें उन नन्हें हाथों को र्निममता से काट गिराया,
उनके बहकावे में आकर तुमनें अपनें बच्चों का भविष्य गँवाया,

अज्ञानता के गर्त में डुबानें को बंद हो रहे शिक्षण संस्थान,
ताकि घाटी के युवाओं की कुंद हो जाए तर्कशक्ति व ज्ञान,

काश्मीर की नारी की हस्ती मिटाने को तुले अलगाववादी गद्दार,
तभी तो मिसाल कायम करनें वाली ज़ायरा वसीम नें की माफ़ी स्वीकार |

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