एक ही पल में वो रूठ जाते हैं
हमें घंटो उन को मनाने में लग जाते हैं
वो रूठने की वज़ह नही बताते
सीधे कोप भवन में चले जाते हैं
हम खोजी पत्रकार बन जाते हैं
वज़ह तलाश्ने की नाकाम कोशिश करते हैं
मद्द को बच्चो की पास जाते हैं
पर बैरंग लिफाफे की तरह लौटा दिए जाते हैं
वक्त की ग़मभीरता को भाप जाते हैं
और तुरंत एक साडी ले आते हैं
फिर हम भी कोप भवन में जाते हैं
साड़ी उन के हाथ में थमाते हैं
वो रोना, रूठ्ना सब भूल जाते हैं
ओर रूठने के वज़ह अंत तक नही बताते हैं

–  संजीव कुमार बर्मन

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