माँ का रूप दिया तुमने

धरती माता मैं कहलाती

धरा भूमि पृथ्वी जननी

पर्यायवाची हैं शब्द मेरे

दीनबंधु ने भार दिया मुझको

वैभव समृध्दि प्रदान करी

निपुण प्राणी कितना है

मिथ्या छद्मी से बना हुआ

पृथ्वी पर कितना पाप बड़े

नेत्रजल करूणा से भरे

ज्वाला एक भड़कती है

संतप्त हुयी मैं कितनी

वृक्षों से धरतीविहीन हुई

धीरजता की सीमा होती

सुधर जाओ दूनिया वालों

पृलय कहीं न लें आऊं

 

 

 

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