मैं बाबरी कुछ बेतल सी आवारा कुछ लगती पागल सी

जाने क्या मैं सोच में रहती बस अपनी ही धुन में रहती

मैं उपवन में जाती हूँ तो सारे पौधे मुझसे मिलते

घुमड़ घुमड़ कर मुझ पर आते प्रेमी बन कर मुझसे मिलते

तितली भंवरे भी आ जाते गुनगुन कर गाना गाते

क्रष्ण की बंसी जब भी बजती मैं राधा सी बन जाती हूँ

जब मुझे गिरधर की याद है आती मैं मीरा सी बन जाती

जब मोहन रास रचाते मैं गोपी फिर बन जाते

मेघ बरसता भिगती रहती माधव तुझमें खोयी रहती

कोई नहीं मुझको को जाने है एक तू ही मुझको पहचाने

बस क्रष्ण मुझमें है मैं क्रष्णमय मैं रहती हूँ

मैं बाबरी सी कुछ बेतल सी आवारा कुछ लगती पागल सी

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