अपनी धुन

अपनी धुन

By |2017-07-20T21:39:28+00:00July 20th, 2017|Categories: आलोचना|0 Comments

मैं बाबरी कुछ बेतल सी आवारा कुछ लगती पागल सी

जाने क्या मैं सोच में रहती बस अपनी ही धुन में रहती

मैं उपवन में जाती हूँ तो सारे पौधे मुझसे मिलते

घुमड़ घुमड़ कर मुझ पर आते प्रेमी बन कर मुझसे मिलते

तितली भंवरे भी आ जाते गुनगुन कर गाना गाते

क्रष्ण की बंसी जब भी बजती मैं राधा सी बन जाती हूँ

जब मुझे गिरधर की याद है आती मैं मीरा सी बन जाती

जब मोहन रास रचाते मैं गोपी फिर बन जाते

मेघ बरसता भिगती रहती माधव तुझमें खोयी रहती

कोई नहीं मुझको को जाने है एक तू ही मुझको पहचाने

बस क्रष्ण मुझमें है मैं क्रष्णमय मैं रहती हूँ

मैं बाबरी सी कुछ बेतल सी आवारा कुछ लगती पागल सी

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