दशवीं कक्षा में ” हरिश्चन्द्र नाटक ” हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में समाहित था। श्मशान घाट में दास कर्म में नियुक्त राजा हरिश्चन्द्र के मन में उठती भावनाओं “मरणों भलो विदेश में जहाँ न आपण कोय,माटी खायँ जनावरा महा महोच्छ्व होय ” का कवि ने कितना मार्मिक चित्रण किया है।
एक छात्र के रूप में परीक्षाओं में भले ही हमने इन पंक्तियों की व्याख्या की हो। किन्तु बैंगलोर प्रवास में मर्म स्पर्शी इन पंक्तियों को याद कर एक समय भाव विभोर हो उठा था।
सोचता हूँ आज इन भावनाओं को शब्द रूप में गढ़ने का एक लघु प्रयास करूं।
गार्हस्थ से बाणप्रस्थ में पहुँचे कुछ ही दिन हुए थे।परंतु बंगलोर का प्रवास शुरू हो चूका था।कुछ दिन मजे में बेफिक्र कटे।” न सुबह उठने की जल्दी,न ऑफिस जाने का टेंशन।जब मन किया उठो।जब मन किया टीवी देखो।मन किया तो कहीं थोड़ा घूम आओ”। यही नई दिन चर्या थी।
पर जीवन के साठ अनमोल वर्ष व्यस्त व्यतीत करने के पश्चात् खाली बैठे रहना बोझ सा लगने लगा था। बालकनी से देखता , कुछ लोग सुबह शाम टहलते रहते। एक दिन मेरी भी इच्छा हुई ,नीचे टहल आऊं।नीचे उतरा,एक दो राउंड घूमा ।फिर ऊपर आ गया।यह समय सारणी का एक अभिन्न अंग बन गया।
धीरे कुछ लोगों से दोस्ती हुई।अपनापन बढ़ा।एक कृष्णन साहब मिले।बहुत ही अच्छी हिंदी बोलते।उनकी हिंदी मैंने पहली बार जब सुना तो ऐसा लगा शायद वे उत्तर भारतीय हों। किन्तु जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया वे तमिल ब्राह्मण हैं,शुद्ध शाकाहारी।
उन्होंने संस्कृत और हिंदी साहित्य का अध्ययन किया था। उन्होंने तब बताया था कि तमिलनाडु में अनेकों ऐसे लोग मिल जायेंगे,जो संस्कृत और हिंदी का अच्छा ज्ञान रखते हैं।पर राजनीतिक कारणों से वे हिंदी का विरोध करते मिल जायेंगे।
धीरे-धीरे कृष्णन साहेब से अच्छी दोस्ती हो गई थी।ईश्वर की असीम कृपा से मित्र मिलते हैं। मुझे भी कृष्णन साहेब मिले। सुबह शाम उनके संग भ्रमण का सिलसिला चल पड़ा।भ्रमण के दौरान ही एक दिन उन्होंने बताया था कि उनकी उम्र पचहत्तर की हो चुकी है। उनकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। उनके दो लड़के थे जो अमेरिका में बस चुके थे। वहीँ उनके लड़कों ने प्रेम विवाह भी कर लिया था। करीब तीन बर्ष पहले उनके लड़के अपनी माँ की श्राद्ध में आये थे। श्राद्ध के बाद उन्हें भी अमेरिका ले जाने की जिद कर रहे थे। पर कृष्णन साहेब ने उन्हें कहा था कि जीवन की सारी कमाई से उन्होंने उनकी पत्नी की इच्छानुसार यह अपार्टमेंट लिया था। यहीं उनकी आत्मा बसती है।इस उम्र में देश छोड़ कर वे कहीं नहीं जायेंगे।
बच्चों की जब नहीं चली तो उन्होंने एक केअर टेकर रख दिया ताकि कृष्णन साहेब की देखभाल हो सके। केअर टेकर का नाम राजू था।तभी से राजू उनके पास रह कर संग पुत्रवत उनकी सेवा कर रहा था।
सुबह शाम भ्रमण के पश्चात मैं और कृष्णन साहेब पार्क में रखे बेंच पर बैठे देर तक मन की बातें किया करते थे। कृष्णन साहेब अक्सर कहते, “जानते हैं विनोदजी ,आपसे बातें करके मन हल्का हो जाता है।किससे बातें करूँ,कोई तो नहीं है घर पर”। समय का पहिया ऐसे ही चलता रहा। हम दोनों के दिन यूँ ही कटते रहे।
इधर कुछ दिनों से कृष्णन साहेब भ्रमण में नहीं आ रहे थे।
एक दिन मैं उनके फ्लैट में जाकर उनसे मिला। वे अस्वस्थ थे।दवा चल रही थी।मुझे देखकर बड़ा खुश हुए। राजू से कहकर मेरे लिए कॉफ़ी बनवाई। लेटे लेटे ही मुझे विदा किया। दूसरे दिन सुबह मोबाइल पर मैसेज मिला – कृष्णन साहेब चल बसे।
भागा भागा मैं उनके अप्पार्टमेंट पहुंचा। सचमुच कृष्णन साहेब नहीं रहे। राजू ने बताया उसने अमेरिका में संबाद भेज दिया है।पर साहेब के दोनों बेटे अभी बहुत व्यस्त हैं,इसलिए दाह संस्कार में दोनों पुत्र नहीं पहुँच पाएंगे।
कारपोरेशन में राजू ने सूचना भेजवा दी थी।शायद कारपोरेशन की गाड़ी पहुँचने वाली थी।मेरी भी बड़ी इच्छा हुई श्मशान घाट तक चलूं , पर बच्चों ने कहा “पापा आप अस्वस्थ हैं, आपको कहीं नहीं जाना है”। कुछ देर में कारपोरेशन की गाड़ी आई।उनके कर्मचारियों ने शव को रखा। मैंने कृष्णन के चरण स्पर्श किये। अर्थी को कांधा दिया। फिर “राम नाम सत्य है” , ये शब्द स्वयं निकल गए। राजू अर्थी के साथ गाड़ी में प्रस्थान कर गया।
कुछ घंटों के बाद मैंने निः शब्द आकाश में चीलों को उड़ते देखा।चीलों के कर्कश स्वर सुनाई पड़ रहे थे। शायद डाह संस्कार संपन्न हो गए थे। मुझे कुछ अस्पष्ट शब्द मुझे सुनाई पड़ रहे थे- “मरणों भलो विदेश में ,जहाँ न आपण कोय।माटी खायँ जनावरा महा महोच्छ्व होय”।
जीवन की वास्तविकता का आभास हो रहा था। आँखे नम हो चुकी थीं।मन ढूंढ़ रहा था पचहत्तर बर्षीय अपने प्रभात भ्रमण के मित्र कृष्णन को जो विलीन हो गए थे- विशाल आकाश में

विनोद कुमार मिश्र

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