फेसबुक पर दो दिनों से महिलाओं की बिना मेकअप की सेल्फियों का दौर चल रहा है। यह तो पता नहीं यह ट्रेंड कब और किसने शुरू किया लेकिन दो दिनों में कई महिलाओं ने बिना काजल बिंदी लिपिस्टिक के अपनी फोटो खूब शेयर की। इनमे से कुछ ने इसमें कुछ लॉजिक सोचा होगा या शायद कुछ विचार किया होगा लेकिन अधिकतर ने सिर्फ खुद को टैग किये जाने के कारण ही ऐसा किया। सोशल मीडिया में लोगों ने आभासी दुनिया के परे भी बेहतरीन संबंध बनाये हैं जहाँ कुछ बातों और अभियानों में बहुत सोच विचार विरोध तर्क वितर्क की आवश्यकता नहीं होती। चूँकि टैग किया गया है इसलिए कर दो क्या हर्ज है? आखिर हर बाल की खाल निकलना जरूरी भी तो नहीं।
वहीँ कुछ लोगों ने इसे स्त्री स्वतंत्रता से जोड़ा इसे स्त्री सशक्ति करण की ओर एक कदम बताया। मानों मेकअप न करना बिंदी काजल लिपिस्टिक ना लगाने भर से कोई महिला सशक्त हो जाएगी। तो कुछ ने सौंदर्य प्रसाधन के करोड़ों रुपयों के बाजार पर ही खतरा महसूस कर लिया। कुछ ने खुद पर जीत बताया कि बिना मेकअप खुद की फोटो डालने की हिम्मत की और मेकअप को खुद की पहचान बनाने से बाहर निकल आये। हम जो हैं वो दिखें। शब्द कम और बात गहरी है। कितने लोग हैं जो है वो ही दिखते हैं। असली मुखौटा तो हम कभी उतार ही नहीं पाते थोड़ी देर के लिए बिंदी काजल भले उतार दें। किसी के कहने पर किसी को दिखाने के लिए उसके बाद फिर वापस।
सुन्दर दिखने की चाह आदिम है फिर स्त्री हो या पुरुष सभी खुद को सदा से सुन्दर दिखने की चाह रखते हैं। ये बात अलग है कि स्त्री के श्रृंगार समय के साथ परिष्कृत होते गए जबकि पुरुषों के कुछ समय के लिए मिट गए थे। पहले पुरुष भी रोली टीका लगा कर घडी अंगूठी गले में चेन कान में इत्र का फाया रख कर ही घर से निकलते थे लेकिन तब भी उनके लिए यह आवश्यक नहीं था जैसा कि स्त्री के लिए। लड़कियों के लिए सूने माथे या सूनी कलाई रहना अच्छा नहीं माना जाता था और विवाहित महिलाओं के लिए तो सौभाग्य के और भी ढेरों प्रतीक थे जिन्हें पहनना अनिवार्य था। धीरे धीरे यह श्रृंगार बंधन बनने लगा। मौसम दिनचर्या रहनसहन के बदलाव तो कारण थे ही स्त्री स्वतंत्रता के पैराकारों ने भी इन्हें बंधन करार दिया। और फिर यह शारीरिक से ज्यादा मानसिक बंधन हो गया। यहाँ रेखांकित करने वाली बात यह है कि सुन्दर दिखने की खुद को सजाने की चाह ख़त्म नहीं हुई। वह तो बल्कि और ज्यादा बढ़ी हाँ उसके तरीके बदल गए। टेटू पियर्सिंग बालों को हाई लाइट करना ट्रेडिशनल या फंकी ज्वेलरी लम्बी सी मांग भरना या छोटा सा सिन्दूर कभी बिंदी के साथ कभी बिंदी के बिना। मतलब चाह तो वहीँ रही बस अब वह बाजार के रुख के अनुसार अपना रुख बदलने लगी।
श्रृंगार उसमे भी सुहाग चिन्हों की अनिवार्यता जरूर ख़त्म हो गई लेकिन उनके प्रति ललक स्वाभाविक रूप से बनी रही। मार्किट में बिंदी कुमकुम के नए नए प्रकार आज भी आ रहे हैं चूड़ियों का मार्केट लाखों करोड़ों का हो गया है। चाँदी के पायल बिछुए का स्थान अन्य मेटल ने ले लिया है। त्यौहार और शादियों के सीजन में इनका करोड़ों का कारोबार होता है। यह बेहद स्वाभाविक है और खुद की मर्जी से ही तो है। असली हासिल तो यही है कि जो किया जाये वह अपनी मर्जी से हो किसी दबाव या जोर जबरजस्ती से नहीं।
कामकाजी महिलाएं जरूर वक्त की कमी से सुविधा के चलते श्रृंगार से दूर हुई हैं लेकिन यह उनकी मर्जी है ना की किसी के कहने से या दबाव से वे ऐसा करती हैं। फिर भी खुद को व्यवस्थित सुरुचि पूर्ण तो वे भी रखती हैं। कभी कभी काम की आवश्यकता या खुद के शौक के लिए भी महिलाएँ श्रृंगार के लिए समय निकल लेती हैं। वहीँ पुरुष भी अब अपने रखरखाव सजने संवारने को पर्याप्त समय देने लगे हैं। पुरुष प्रसाधन की बड़ी रेंज मार्केट में है साथ ही एक्सेसरीज की भी कई वैरायटी हैं। क्रीम जेल परफ्यूम डीयो सभी श्रृंगार के साधन ही तो हैं।
एक बात और भी है रोज़मर्रा के जीवन में हम कितना मेकअप करते हैं ? काजल बिंदी क्रीम बहुत ज्यादा तो लिपस्टिक वह भी बाहर आनेजाने पर। दो चार दिन के ऐसे अभियान के लिए फोटो खिंचाते दो पाँच मिनिट बिना मेकअप के कितना बाजार डाउन हो जायेगा ? जो इसे स्त्री सशक्तिकरण का बड़ा पड़ाव साबित किया जा रहा है।
लब्बोलुआब यह है कि ऐसे अभियान क्या वाकई कुछ हासिल करते हैं या यह सोशल मीडिया के शिगूफे हैं जो लोगों को इस पर सक्रिय बने रहने के लिए उकसाते रहते हैं। याद करिये सोशल मीडिया पर थोड़े थोड़े समय अंतराल पर ऐसे अभियान चलते रहते हैं और हम उकताए लोग कुछ करने के लिए कर जाते हैं और दो दिन बाद वही हो जाते है जो वास्तव में हैं।
खैर बगैर मेकअप की सेल्फियाँ भी दो तीन दिन धूम मचा कर समय के अंधकार में खो जाएँगी। कुछ लोग दिमागी कसरत करेंगे कुछ अपने तर्कों से जीत हार दर्ज करेंगे। लेकिन यह तथ्य तो रहेगा ही कि महिलाओं ने फोटो खिंचाने के लिए मेकअप किसी के कहने से छोड़ा अपनी मर्जी से नहीं। तो फिर कहाँ आ गए हम ?
कविता वर्मा
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