माँ जैसी

छः महीने की लम्बी बीमारी के बाद संधान नहीं रही इसलिए पिछले कुछ दिनों से सरला जी की बहू दुखी और परेशान रहती थी | उसका दुःख बाटने को सरला जी अक्सर नाश्ता-खाना लेकर उसके कमरे में चली जाया करतीं, जिससे बहू को माँ की कमी न महसूस हो |

उस दिन बहू की पसंद का नाश्ता बनाकर उसके कमरे तक पहुंची तो उन्हें लगा कि बहू फोन पर बात जार रही है | वे चुपचाप दरवाजे के बाहर ही खड़ी हो गई ताकि वो डिस्टर्व न हो |

बहू फोन पर कह रही थी- “किसी के अच्छा होने से क्या फायदा | भगवान ने मेरी माँ को तो पास बुला लिया और जिन्हें बुलाना चाहिए था, उन्हें हमारे झेलने के लिए छोड़ दिया | आखिर मैं उन्हें कब तक इस तरह झेलती रहूँ मेरी भी तो अपनी कोई जिन्दगी है |”

बहू की बातें तो और भी चलती रही जिसका मतलब बाहर खड़ी सरला जी अच्छी तरह से समझ रहीं थी | कई सालों से माँ जैसी बनने की कोशिश करने वाली सासू माँ निराश कदमों से केवल सास बनकर लौट आई |

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