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By |2017-07-24T21:11:23+00:00July 24th, 2017|Categories: धारावाहिक|0 Comments

यथार्थ

   (उपन्यास- अध्याय 2)

…. सिर्फ पॉच मिनट में समीक्षा मकड़ी के जाल से पटे उस स्टोर रूम का दरवाज़ा खोल रही थी। मकान के पिछले हिस्से में बने इस अन्धेरे, दस स्केव्यर फीट के छोटे से स्टोर रूम में समीक्षा के दादा-दादी के जमाने की बेहद पुरानी चीजें रखीं हुईं हैं-पूरी तरह उपेक्षित। इन्हें आखिरी बार तभी देखा गया था, जब रंजन जी इस मकान में आये थे। उसके बाद ये सामान कभी अपनी जगह से षायद ही हिला हो।
हॉस्टेल में पलने की वज़ह से समीक्षा को यहॉ रखे सामान के बारे में कोई भी अन्दाज़ा नहीं है। हॉ बस एक बार उसने अरूण के साथ यहॉ आकर, एक छोटी सी कुदाल जरूर निकाली थी, ताकि बाहर बंजर पड़़ी ज़मीन को बगीचे में बदल सके।
हर तरफ एक नज़र मारने के बाद उसने सब से पहले लकड़ी की एक पुरानी अलमारी के पल्ले खोले। ये बिल्कुल खाली है। सब से ऊपरी खाना जिसमें देखने के लिए समीक्षा का कद कम पड़ रहा था, वहॉ उसने हाथ फेरा, मग़र सिवाय धूल के उसके हाथों कुछ भी ना लगा। अलमारी बन्द करके समीक्षा ने एक पल रूककर सोचा, कि कहॉ से षुरू करे? और जब एक बार उसने अपनी धुन में वहॉ रखा सामान देखना षुरू किया, तो फिर सारा सामान उधेड कर ही सॉस ली। पुराने सन्दूक, बेंत की टोकरियॉ, किताबें, रद्दी में बदल गयी मैंगजीन्स, अपने दादा की डायरियॉ जिनमें सिर्फ काम का लेखा-जोखा था, और कई पुरानी तस्वीरें। उसने सब कुछ देख लिया लेकिन यहॉ भी जवाब ही है, जो पहले था। दोस्त-रिष्तेदार-पड़़ोसी, सब इन तस्वीरों में कहीं ना कहीं है, लेकिन आकाष या सुधा की कोई झलक तक नहीं।
अपने थके दोनों हाथ सिर के ऊपर बॉधें वह कुछ पलों को खड़ी रही। करीब एक घन्टा उसने इस स्टोर को दिया। बड़ी उम्मीद थी उसे कि अतीत के इस सामान से उसे जरूर कुछ ना कुछ मिलेगा लेकिन….।
वहॉ बिखेरा सारा सामान उसने वापस जगह पर लगाया, और खाली हाथ झाड़कर निकल रही थी कि अलमारी के ऊपर से ठीक उसके पंजों के पास अचानक कुछ आ ग़िरा। समीक्षा ने गर्दन झुकायी। ये उसी की एक फ्रेम्ड तस्वीर है, षायद तब की, जब वह 5 या 6 महीने की रही होगी। समीक्षा ने वह तस्वीर हाथ में ली, और बड़े चाव से अपनी आस्तीन से उस पर जमीं धूल साफ की। यह आज़ भी बिल्कुल नयी है।
अपने कमरे में आकर उसने उस तस्वीर को अपने सिरहाने की खाली दीवार पर लगा दिया।
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षाम साढे छरू बजे।
कॉर्डलेस फोन पर किसी गा्रहक से बहस करतीं हुई कविता जी बैठक के एक सिरे से दूसरे सिरे तक टहल रहीं हैं। लगभग 38 की हो गयीं हैं, लेकिन ये काले रंग का प्लॉजो उन पर उतना ही खूबसूरत रहा है, जैसा किसी 25 बरस की लड़की पर लगता। बस उनकी ऑखों के इर्द-गिर्द छाये गहरे घेरों पर ध्यान ना दिया जाये तो कोई नहीं कह सकता, कि ये समीक्षा और अरूण जैसे दो जवान बच्चों की मॉ हैं। ना उनकी आवाज में बुढापा है, ना उनके चेहरे पर और ना ही कमर तक लटकते काले बालों पर।
कविता जी को अनदेखा करते हुए समीक्षा चुपचाप बाहर जा रही थी, कि उनकी नज़र उस पर पड़ गयी।
“अब तू कहॉ जा रही है?” कार्डलेस फोन को थोड़ा नीचे सरकाकर उन्होनें सख्त आवाज में पूछा।
समीक्षा वहीं ठिठक गयी। धीरे से पलटते हुए-“नेहा के पास।”
“कोई जरूरत नहीं है, अपने कमरे में जाओ! और वह तुम्हारी फेरवल की स्पीच तैयार हो गयी?” कॉल काटकर वह समीक्षा के पास आकर रूकीं।
“वह मैं रात को कर लूॅगी। अभी मुझे नेहा से कुछ काम था-”
“क्या काम था?” कविता जी ने बॉहें आपस में बॉध लीं।
रंजन जी से हुई बहस का असर अब तक है उनके मूढ़ पर। “सारा दिन उसके साथ क्या बातें करती रहती हो तुम? उसके अलावा और भी लोग हैं तुम्हारे आस-पास। मैं हूॅ, अरूण है, तुम्हारे पापा हैं!”
“यॅस आई नो कि आप सब भी है।” समीक्षा मुॅह फेरते हुए खुद में ही बडबड़ायी
“अब तुम हॉस्टेल मेंं नहीं रह गयी हो समीक्षा, तुम अपने परिवार में हो। वी नीड यू हेयर! हम तुम्हारी ज़िन्दगी के सब से ख़ास लोग हैं। जो कुछ तुम उससे बताती हो, वह हमसे भी बता सकती हो और-”
“इटस लिमिट!”
कहते हुए समीक्षा उसके सामने से हट गयी। वापस अपने उसी कमरे में चली आयी और उसके कमरे का दरवाज़ा फिर पहले की तरह बन्द हो गया।
कविता जी कार्डलेस फोन हाथ में पकड़े उसे देखतीं ही रह गयीं। वह ये नहीं समझ पा रहीं, कि जो सख्ती वह समीक्षा के साथ आज़ कर रहीं है, वह करने का वक्त बीत चुका है। हॉस्टेल की ज़िन्दगी ने समीक्षा को सिर्फ अनुषासन ही नहीं सिखाया, बल्कि अपनी ज़िन्दगी अपने तरीके से जीना भी सिखा दिया है। वह अकेलेपन और अपने फैसले खुद करने की आदि हो चुकी है। उसे किसी बाहरी इन्सान की राय अपनेआप पर थोपना पसन्द नहीं, चाहे वह इन्सान उसके परिवार से ही क्यां ना हो? रिष्तों को जानना और उन्हें जीना उसके लिए दो अलग बातें हो गयीं हैं।
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उसी रात 11 बजे।
1970 के दशक की पुरानी रूप-रेखा में ढले शीशम के इस ड्रेसिंग पर पॉच फुट लम्बा एक आईना जडा है जिसमें समीक्षा खुद को सिर से पॉव तक देख सकती है। और अजीब है कि जब भी खुद को वह किसी आईने में देखती है, तो लगता है जैसे उसकी ऑखों से कोई और ही उसे देख रहा हो। मानों ये ऑखें तो उसी की हैं, लेकिन नज़र किसी और की। ऐसी नज़रें जो कुछ और देखना ही नहीं चाहतीं। जिनके मुताबिक उससे खूबसूरत कोई है ही नहीं। ऐसी नजरें, जो जब भी उसे देखतीं है तो अटक सीं जातीं हैं उसके चेहरे पर।
स्पीच की तैयारी करते हुए उसे आधा घण्टा ही बीता था, कि अचानक उसकी सॉसों ने किसी अन्जानी महक का स्वाद चखा। उसके बड़बड़ाते हांठ रूक गये। कमरे के किसी कोने से कोई गन्दी सी महक आने लगी है। एक अन्जानी-घुटी सी महक।
कागज मोड़कर जीन्स की जेब में ढॅूसते हुए वह कमरे मेंं इस गन्ध की वज़ह तलाशने लगी। सब से पहले अपने घुटनों पर बैठकर उसने पलंग के नीचे झॉका। मसूरी के मकानों में लकड़ी बहुत ज्यादा इस्तेमाल होती है। चूहों की तादात यहॉ इन्सानों से चार गुना ज्यादा है, मुमकिन है कि कोई चूहा वगैरह मर कर सड रहा हो? मोबाईल के टार्च से इसके चारों अन्धेरे कोने रोशन कर के देखा-फर्श उसके आईने की तरह ही साफ है।
वह उठ गयी।
उसने अपनी अलमारी में रखे कपड़े खदेड दिये, लेकिन ये गन्ध यहॉ से नहीं आ रही। किसी सन्देह के साथ उसका चेहरा अब खिड़की की ओर घूमा। उसने खिड़की से बाहर झॉकते हुए कई गहरी सॉसें लीं, लेकिन यहॉ से आ अन्दर आ रही ठण्डी हवा में भी बस रात-की-रानी की भीनी खुशबू है, और कुछ नहीं।
“स्ट्रैन्ज!” कमर पर हाथ रखे हुए उसने मुॅह के अन्दर ही कहा।
एक तो ये गन्ध बिल्कुल नयी है, और फिर रात के अन्धेरे की तरह बढती भी जा रही है। आखिर में जब उसे कुछ समझ नहीं आया, तो उसने जाकर खिड़की का पर्दा खींचा, और अपने कमरे में बहुत सा इत्र छिडक कर सोने चली गयी। गहरी नींद में डूबने तक उसे महसूस होता रहा कि उस महक की दिषा बार-बार बदल रही है। वह उसके कमरे के किसी एक कोने में ठहर नहीं रही थी।
फिर देर रात…।

 

 

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