ग़र मिलती हमें मुमताज

ग़र मिलती हमें मुमताज

कहते हैं तुमसे आज, बयां करते हैं दिल का राज।

ग़र मिलती हमें मुमताज तो बनवा देते हम भी ताज ।।

मोहब्‍बत से ही दुनिया है, दुनिया में मोहब्‍बत है

दुनिया में हमें भी तो, हसीं चेहरे की चाहत है ।

दुनिया में मोहब्‍बत का, बस है यही अंदाज

ग़र मिलती हमें मुमताज तो बनवा देते हम भी ताज ।।

मोहब्‍बत की ही ख्‍वाहिश में, जवानी बीत रही सारी

हसीं चेहरे को पाने की, अभी तलाश है जारी ।

तन्‍हा में निकलती है, हमारे दिल से ये आवाज

ग़र मिलती हमें मुमताज तो बनवा देते हम भी ताज ।।

किया करती हमें वो याद, उन्‍हें हम याद किया करते

गिले-शिकवे सभी करते, बिछुड़ कर जब कभी मिलते ।

जो मैं सोच रहा हूं वो, होगा ना शायद आज ।

ग़र मिलती हमें मुमताज तो बनवा देते हम भी ताज ।।

 संजय कुमार शर्मा ‘प्रेम’

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This Post Has 2 Comments

  1. ग़र मिलती हमें मुमताज तो बनवा देते हम भी ताज …वाह वाह बहुत खूब।

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  2. कुछ लिखने की कोशिश मात्र है…

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