सूरज अपने उदय होने का संकेत तो दे रहा था, परंतु कोहरे के बीच कुछ भी दिखाई नही दे रहा था,तभी वृद्धाआश्रम का मुख्य द्वार टक-टक बजा ।
चौकीदार ने जा कर देखा तो एक वृद्ध और उनकी पत्नी थे,जो अपने बेटे और बहू डॉ.उषा के घर से निकाले जाने के बाद यहाँ शरण लेने की उम्मीद से आये थे। वो देखने से ही शरीर और समय दोनो से हारे हुये दिखाई दे रहे थे।
तभी चौकीदार ने उन्हें बरामदे में बैठा कर वहाँ के मालिक को आवाज़ लगाई “बाबू जी, बाबू जी दो लोग आये हैं “बाबू जी तुरंत नीचे आये उनका अभिवादन करके आश्रम की औपचरिकता के लिये रजिस्टर निकाला ।”श्रीमान आपका नाम “…”जी विशम्भर नाथ “…”और आपकी पत्नी का”…”सावित्री देवी”
सुनते ही बाबू जी की कलम लड़खड़ा गई, अपने चश्मे के साथ अतीत की धुंधली तस्वीर को साफ़ करते हुए उनकी और देखा,जिन्हे पहचानना मुश्किल था पर असंभव नही ।
वही उन दोनों पति पत्नी के सामने भी इतिहास के पन्ने खुल कर फड़फड़ाने लगे उनके हाथ पैर कांप गये, नज़रें ज़मीन में गढ़ गई, कदम जैसे उल्टे पांव लौटने को बेताब थे।
तभी बाबू जी ने उन्हें भीगती लज्जा से बाहर निकालते हुये उनके हाथों में अपना पेन थमा दिया,”आप यहां हस्ताक्षर कर दीजिए, आप आज से हमारे परिवार के सदस्य है”…इससे पहले की वह कुछ कहते, बाबू जी ने अपनी बेटी सुनीता को बुलाया,जो सहायिका के रूप में पिता का हाथ बटाती थी।
सुनीता ! जो वर्षों पहले उनके लिये मर गई थी ,कुछ पल भावनाशून्य खड़ी रही,फिर अपनी साड़ी का पल्लू सर पर रख बड़ी श्रद्धा से उनके पैर छुये।…”चलिए बाबू जी आपको आपके कमरे तक ले चलती हुं, उस समय आपकी सेवा अधूरी रह गई थी जिसे पूरा करने का सौभाग्य ईश्वर ने आज फिर से मुझे दिया है”।..कहते हुये सुनीता ने उनका सामान उठा लिया।
विशम्भरनाथ और सुमित्रा देवी विधाता के लेख को समझने की कोशिश करते हुए एक अपराधी की भांति उसके साथ चले जा रहे थे।…क्योंकि सुनीता उनकी वही बहू थी जिसे उन्होंने दहेज के कारण अनपढ़ गंवार कहते हुए घर से धक्के मार कर निकाल दिया था। और उसके स्थान पर अमीर घर की बेटी उषा को अपने बेटे की दूसरी पत्नी के रुप में चुना।

डॉ .किरण पांचाल (अंकनी)

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