मन का पंक्षी उड़ रहा है
नीचे है सागर ही सागर
विश्राम करूं कहां पर जाकर
कोई कहीं भूमि मिल जाए
तो मन का पंक्षी रूक जाए

मन का पंक्षी उड़ रहा है
नीचे है सागर ही सागर
कोई दोष इसमें है इसका
अरूण बना प्रयोजन लेकर
कटाक्ष करेगा जाने किस पर

मन का पंक्षी उड़ रहा है
नीचे है सागर ही सागर
पूज्य बना कुछ दक्ष बनकर
एक ग़ह पर जाकर ये तो
पुच्छल तारा तोड़ रहा है
शुभरात्रि

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