आरजू

आरजू ! बस इतनी कि….

सफलता की  बुलंदियों

को  छू  लूँ ,,,

बनके उन्मुक्त परों का पंछी

झूमती घटाओं को चूम लूँ ।

आरजू ! बस इतनी कि….

तमन्नाओं के हँसीं जहाँ में

अपना आशियाँ बना लूँ ,,

मचलती  इंदुराशि  को

अपने दामन में सजा लूँ ।

आरजू ! बस इतनी कि….

अपने ख्वाबों को हकीकत

में तब्दील कर दूँ ,,,

अपने दृगंचल में सफलता

के मोती बसा लूँ  ।

आरजू ! बस इतनी कि….

भविष्य और वर्तमान को

अपने अनुरूप आकार दूँ,,

राहों में खड़ी तमाम

बाधाओं से टकरा जाऊँ ।

आरजू ! बस इतनी कि….

दिल जो मेरा चाहे

उसे करके दिखा दूँ ,,

जो हो शब्द असंभव

उसे  संभव बना दूँ ।

–  सुप्रिया सिन्हा

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