सपने

सपने
हम में से उन सभी को देखने चाहिये
जिन्होंने सुराख की चाह रखी है
क्योंकि सपने अचानक हथेलियों पर
उग नहीं आते,
उसके लिये बुनने होते है कई-कई सपने
जलना होता है
आग की भट्ठियों में
तपाना होता है अपने आप को
सपने उन्हें देखने चाहिये
जो इस दौर में भी
अपने को बारीक सुरक्षित
रख पाये है
माँ तो रोज़ देखती है सपने,
पिता भी कभी-कभार देख लेते है सपने
बहन-भाई तो रोज़ देखते है नये-नये सपने
लेकिन
क्या सपने वे नहीं देखते है
जो दंगों के भेंट चढ़ जाते होंगे,
और उसके बाद
उनके पूरे के पूरे सपने अधूरे रह जाते होंगे
इस देश में गनी मियाँ के भी कुछ तो
सपने जरूर रहे होंगे
जैसे ठीक गाँधी और नेहरू के सपने थे
आखिर उनके पूर्वज भी तो यहीं पर विभाजन के बाद बसे थे
उन्होंने भी इस देश के लिये
अपना लहू बहाया था,
लेकिन उनका हुआ क्या?
किन राष्ट्रवादियों के वह शिकार हो गये
मेरी माँ कहती है
कि-“गनी भाई गौरक्षकों के ही शिकार हुये थे”
जैसे पहले इसी देश में
अख़लाक,जुनैद भी मार दिये गये
और उसके बाद
उनके सारे सपने उन्हीं तक जज्ब़ हो गये
जुनैद तो पंद्रह बरस का नवयुवक था
उसके सपने तो और भी ज्यादा अंकुरित थे
वह इसी देश में
औरों की तरह
सिपाही बन सकता था
प्रोफेसर बन सकता था
राजनीतिज्ञ बन सकता था
और
यदि तराजू सही हो तो
तो वह इसी देश का प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी बन सकता था
लेकिन राष्ट्रवादियों ने
उसके सपने को भी
कब्र में काफी गहरे तक दफनाया
लेकिन उम्मीदों का कई-कई क्रम
टूट जाने के बावजूद
फिर भी सपने नहीं टूटने चाहिये
इसलिये
सपने हम में से सभी को देखने चाहिये।।

-शशांक पाण्डेय 

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