मधुवन भी तरसे है

धरती की प्यास बुझी , बदरा जो बरसे है !
नयनों में आशा जगी , मन सबके हरषे है !!

खेत तरबतर जो हुए , बीज अब सरसेगा !
सावनी छटाओं को , जिया अभी तरसे है !!

लबालब सरोवर हुए , नदिया भी लहराई !
दिनकर है अवकाश पर , धूप नहीं बरसे है !!

पेड़ों पर टंगे झूले , हंसी सजी होंठों पर !
प्रियतम की अगुआई , अंखियों में दरसे है !!

यों बूंदे करे टिपटिप , नींदें उड़ी सबकी !
अगन मिटी है तन की , भाव यही परसे है !!

हवाओं से सरगोशी , रातें करें हैं बयां !
झूमती हवाओं को , मधुवन भी तरसे है !!

बेकरार सब हैं यहाँ , राहत सभी चाहें !
किस्मत में था मिल गया , रब के वो दर से है !!
– भगवती प्रसाद व्यास 

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