क्या आपको मालूम है कि पुराने समय में प्रचलित पर्दाप्रथा के कारण ही जग प्रसिद्ध इमारत जयपुर के हवा महल का निर्माण हुआ। यह कपोलकल्पित तथ्य नहीं है वरन् एक सत्य है। जिस समय रजवाडे की महिलाऐं और रानियां पर्दे में रहती थी और महलों से बाहर जाने के लिए पालकियों का उपयोग किया जाता था, ऐसे में रानियां विशेष उत्सवों पर निकलने वाली शोभा यात्रा, जुलूस एवं शहर को कैसे देखे इस विचार की ही परिणाम है हवा महल जैसे आर्कषक भवन का निर्माण। हवा महल की सबसे ऊपरी दो मंजिलों तक पहुंचने के लिए खुर्रों की व्यवस्था की गई है। रानियां को लम्बे घेरदार घाघरे पहन कर सीढ़ियां चढ़ने में होने वाली असुविधा को देखकर यह व्यवस्था की गई।
दुनिया में खूबसूरत इस ऐतिहासिक धरोहर की कई विशेषताएं इसका महत्व बढ़ाती है। शायद यह दुनिया की पहली ऐसी इमारत है जिसे बिना नींव के पांच मंजिला बनाया गया है। राधा-कृष्ण को समर्पित भवन बाहर से देखने पर कृष्ण के मुकुट के समान प्रतीत होता है। गौरतलब यह भी है कि पांचवी मंजिल तक पहुंचने के लिए किसी प्रकार की सीढ़ियां नहीं बनी है केवल ऊपर जाने के लिए रेम्प बना दिया गया है। भवन में 953 खिडकियां एवं झरोखें बने हैं, जिनमें कुछ रचनाएं लकड़ियां से बनाई गई है। रानियां इन झरोखों से झांक कर सड़क पर होने वाले उत्सवां को देखती थी। इन खिडकियां के चारों ओर जिस प्रकार जालीनुमा रचना बनाई गयी है, उससे बाहर के लोग अन्दर कुछ भी नहीं देख सकते थे। यह रचना एक प्रकार से पारदर्शी पर्दे का काम करती थी। इन झरोखां से अन्दर की ओर तेज हवा आने से इस भवन को हवा महल का नाम दिया गया। राजस्थान आने वाले सैलानी इस खूबसूरत भवन के चित्र अवश्य ही स्मृति के रूप में साथ ले जाते हैं।
विश्व की इस खूबसूरत इमारत को जयपुर के महाराजा सवाई प्रताप सिंह द्वारा वर्ष 1799 में बनवाया गया था। भवन का निर्माण उनकी मंशा के अनुरूप तत्कालीन वास्तुकार लाल चन्द उस्ताद द्वारा डिजाइन किया गया था। पिरामिड़ के आकार का यह भवन अपने मुख्य आधार से 50 फीट ऊंचा है। भवन की छोटी-छोटी खिडकियों पर नक्कासीदार जालियां, कंगूरे और गुम्बद आकर्षक रूप से बनाये गये है। अनकों अर्द्ध अष्टभुजाकार झरोखों को अपने में समेटे यह बेजोड़ संरचना दुनिया भर की इमारतों के लिए एक मिसाल है। महल के भीतरी भाग में कक्ष बने हुए हैं। यह भवन चूने, लाल व गुलाबी बलुआ पत्थर से जयपुर के हृदयस्थल में बड़ी चौपड़ के समीप बनाया गया हैं। यह भवन सिटी पैलेस का ही एक हिस्सा है जो जनाना कक्ष तक फैला हुआ हैं। यह भवन जयपुर को ”गुलाबी नगरी“ की संज्ञा देने का सबसे बड़ा माध्यम एवं प्रमाण है। भवन हिन्दु, राजपूत एवं मुगल शिल्प कला के संयोजन का बेहतरीन उदारहण है। फूल-पत्तियों का आकर्षक काम, गुम्बद और विशाल खम्भे राजपूत शिल्पकला एवं पत्थर पर की गई नक्काशी, सुन्दर मेहराब मुगल शिल्पकला के नायाब उदारहण हैं।
वर्तमान में हवा महल के अन्दर एक संग्रहालय भी स्थापित किया गया है। भवन की देखरेख पुरातत्व विभाग द्वारा की जाती है। वर्ष 2005 में विभाग द्वारा लम्बे समय बाद इसकी मरम्मत व नवीनीकरण का कार्य किया गया था। कॉर्पोरेट क्षेत्र के यूनिट ट्रस्ट ऑफ इण्डिया ने इसके सार संभाल का जिम्मा लिया है। हवा महल देखने के लिए जयपुर भारत के सभी प्रमुख शहरों से सड़क, रेल एवं हवाई मार्ग से जुडा है।

-डॉ.प्रभात कुमार सिंघल

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