काले-काले बादल

मोती रूपी बूँदो का ये,

खूब खजाना लुटाते है।

धरती का करके हार – श्रृंगार,

सब के मन को भा जाते है।

काले-काले बादल आकाश मे,

जब भी छा जाते है।

नन्हे-नन्हे बालक बारिश मे,

खूब करते है मस्ती।

नहाए हुए से लगते है सब,

कूचा-कूचा, बस्ती-बस्ती।

पक्षी भी मीठ-मीठे स्वर मे,

शाखाओं पर गुनगुनाते है।

काले-काले बादल आकाश मे,

जब भी छा जाते है।

प्रकृति पर भी यौवन की,

नई बहार आ जाती है।

प्रेमियो के मन मे तो बारिश,

आग सी लगाती है।

पुष्पो और कलियों के भी,

चेहरे खिल-खिल जाते है।

काले-काले बादल आकाश मे,

जब भी छा जाते है।

 

– पुनीत कुमार 

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