श्रद्धा और एकाग्रता से किया गया भोजन सदा बल और पराक्रम प्रदान करता है। अपमानपूर्वक ,क्रोध, विवाद आदि तथा अश्रद्धा से किया गया भोजन बल और पराक्रम दोनों को नष्ट कर देता है।इसलिए भोजन सदैव अच्छे मन से तथा श्रद्धा से करना चाहिए।
(मनु स्मृति–2/55)
जैसा खाएं अन्न,वैसा होगा मन——-
आयर्वेद में कहा गया है, जो अन्न जहां पैदा होता हो,ऋतु अनुसार हो तथा वहीं के लोगों द्वारा उपयोग में लाया जाय तो वह औषधि के समान है।
साथ ही सात्विकता से अर्जित तथा प्रेम पूर्वक पकाया गया हो तो उसका महत्व और बढ़ जाता है।
खाने पर आचार विचार का भी प्रभाव पड़ता है।कई बार वृद्ध महिलाओं को माता बहनों से कहते सुना होगा कि, अगर माँ क्रोध में हो,परिश्रम कर के आई हो,या किसी मानसिक या शारीरिक आवेग से ग्रसित हो तो बच्चे को दूध नहीं पिलाना चाहिए।क्योंकि वह बच्चे को नुकसान करेग।
अपने पुराने संस्कारों के अभाव में मनुष्य जिव्हा के अधीन हो गया है।माता बहनें अपने बच्चों को मैगी, जंक फ़ूड खिला रही हैं, उनसे आप चुस्ती एकाग्रता आदि की कैसे उम्मीद कर सकते हैं।शरीर और मस्तिष्क को दुरुस्त रखना है तो स्वाद के लालच से बचना चाहिए,इस बात को सभी जानते हैं, लेकिन अमल में नहीं लाते।
अगर राजस्थान, हरयाणा, मध्यप्रदेश,यूपी के लोग नियमित दक्षिण भारतीय खाना खाने लगें तो पेट में अम्ल(acidity)बनना तय है।राजस्थान के मारवाड़ में ज्यादातर मोटा अनाज का इस्तेमाल ठीक रहता है, क्योंकि वही वहां की पैदावार है।
फल भी जो जिस ऋतु में होता है, वही फायदेमंद है।तरबूज गर्मियों का फल है, जो तीखी गर्मी से निजात भी दिलाता है तथा स्वादिष्ट भी लगता है।वहीं यह आजकल वर्षभर मिलने पर न तो अच्छा लगेगा ना ही फायदा करेगा।
ताजे फल,सब्जी,दालें आदि मानव के लिए बने हैं।मनुष्य मूलतः एक शाकाहारी प्राणी है।चिकित्सक भी शाकाहार पर जोर देते हैं।इनमें वे सब पोषक तत्व होते हैं जो हमारे शरीर को चाहिए।भोजन में बहुरंगी (multicolor)सब्जियां खाकर हम स्वस्थ रह सकते हैं।हरी सब्जी में आयरन,प्रोटीन भरपूर होता है।मुंग,मसूर,राजमा,छोले आदि दालें प्रोटीन,जिंक कैल्शियम आदि से भरपूर होती हैं।पर हमेशा मौसम अनुसार ही फल सब्जियां खानी चाहिए।
वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि मांसाहार तथा डेयरी उत्पाद से जीवनशैली की ज्यादा गंभीर बीमारी आती है।मांसाहार व्यक्ति की अपेक्षा शाकाहारी व्यक्ति में व्यवहारिक परेशानियाँ, स्वभाव शांत एवं सरल होगा।

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