दप दप करता रूप तुम्हारा , ऋतुओं सा बल खाये !
आग का गोला काहे बरसे , तुमसे सहा न जाये !!

नज़रें हैं बेताब बता दो , किसकी है अगवानी !
इंतज़ार का पल पल आखिर , हाथों में ने आये !!

बाग बगीचे पीछे छूटे , राह नई है पकड़ी !
आज हवा से करती बातें , चुनरी सरकी जाये !!

रंग बिरंगे परिधानों में , निकली हो सज़ धज कर !
आज मुसाफिर का कसूर क्या , राहें भूला जाये !!

कौन कोण से देखें तुमको , नाज़ों अदा कायम है !
यहां रूप की गागर देखो , लहराती बल खाये !!

कौन लक्ष्य ठाना है दिल में , किसको आज पता है !
अंतरतम के भाव तुम्हारे , हम तो जान न पाये !!

आज लबों पर है खामोशी , खुशियां भी गुमसुम हैं !
दूर का राही तुमसे कोई , ठगी नहीं कर जाये !!

— बृज व्यास

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