चुनरी सरकी जाये

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चुनरी सरकी जाये

By |2017-08-02T20:46:44+00:00August 2nd, 2017|Categories: गीत-ग़ज़ल|3 Comments

 

दप दप करता रूप तुम्हारा , ऋतुओं सा बल खाये !
आग का गोला काहे बरसे , तुमसे सहा न जाये !!

नज़रें हैं बेताब बता दो , किसकी है अगवानी !
इंतज़ार का पल पल आखिर , हाथों में ने आये !!

बाग बगीचे पीछे छूटे , राह नई है पकड़ी !
आज हवा से करती बातें , चुनरी सरकी जाये !!

रंग बिरंगे परिधानों में , निकली हो सज़ धज कर !
आज मुसाफिर का कसूर क्या , राहें भूला जाये !!

कौन कोण से देखें तुमको , नाज़ों अदा कायम है !
यहां रूप की गागर देखो , लहराती बल खाये !!

कौन लक्ष्य ठाना है दिल में , किसको आज पता है !
अंतरतम के भाव तुम्हारे , हम तो जान न पाये !!

आज लबों पर है खामोशी , खुशियां भी गुमसुम हैं !
दूर का राही तुमसे कोई , ठगी नहीं कर जाये !!

— बृज व्यास

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3 Comments

  1. डॉ. मनोहर अभय August 2, 2017 at 9:14 pm

    सुन्दर और साहसिक उद्यम बधाई

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  2. Manju Singh August 2, 2017 at 11:16 pm

    Badhiya hai !!

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  3. Kumud vyas August 16, 2017 at 7:53 pm

    भावपूर्ण गीत !

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